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क्या आपको पता है डॉ. आम्बेडकर के नीले कोट का रहस्य, यहां पढ़िए | GK IN HINDI

Why Dr Bhimrao Ambedkar beer blue colour coat

यह तो हम सभी जानते हैं कि डॉक्टर भीमराव अंबेडकर नीले रंग का कोट पहनना पसंद करते थे लेकिन क्या आप बता सकते हैं डॉ आंबेडकर ब्लू कलर के कपड़े क्यों पहनते थे। भगवा हिंदू, हरा मुसलमान, सफेद ईसाई क्या इसलिए डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने 'नीला दलित' की परिकल्पना की थी। इस तर्क को स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि डॉ आंबेडकर अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोगों को समाज के अन्य लोगों के साथ समान स्तर पर देखना चाहते थे। मोहम्मद अली जिन्ना की तरह अपने समाज की कोई नई और अलग पहचान बनाने का अभियान डॉक्टर अंबेडकर ने कभी नहीं चलाया। तो फिर क्या ब्लू कलर के कपड़े पहनने के पीछे कोई और रहस्य था। आइए जानते हैं:

बड़ा सवाल: डॉक्टर भीमराव अंबेडकर छुआछूत के खिलाफ थे या भेदभाव के

यह तो सभी जानते हैं कि जैसे-जैसे डॉक्टर अंबेडकर उच्च शिक्षित होते गए वैसे-वैसे वह छुआछूत के खिलाफ अभियान को तेज करते चले गए। इस पोस्ट में आपको एक बड़ी बात पता चलेगी और वह यह कि डॉक्टर भीमराव अंबेडकर भारत की जातिगत छुआछूत के खिलाफ ही नहीं बल्कि दुनिया भर में सभी प्रकार के भेदभाव के खिलाफ थे। डॉक्टर अंबेडकर जब लंदन में पढ़ रहे थे तब उन्होंने देखा कि यहां भारत की तरह जातिगत छुआछूत नहीं है लेकिन भेदभाव तो यहां भी है। 

भारत में कमजोर लोगों को भेदभाव से बचाने का आंदोलन था ब्लू कलर का कोट

डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने देखा कि लंदन में व्हाइट कॉलर जॉब और ब्लू कॉलर जॉब प्रचलित हैं। व्हाइट कॉलर जॉब में लोग आराम से कुर्सी पर बैठकर मजे करते हैं और किसी प्रकार का कठिन परिश्रम नहीं करना पड़ता। लोग उनको को सलाम करते हैं। जबकि ब्लू कॉलर जॉब वाले व्यक्ति दिन-रात परिश्रम करते हैं धूप में रहते हैं और ऐसा करने के बाद भी सलाम करते हैं।

यह व्हाइट कलर जॉब और ब्लू कॉलर जॉब जाति व्यवस्था पर आधारित नहीं थी। यह योग्यता पर आधारित थी। जब भीमराव अंबेडकर अपनी शिक्षा पूर्ण करके भारत वापस आए तो उन्होंने भारत में उच्च पद पर रहते हुए और भारत का संविधान लिखते हुए नीले रंग को अपनाया ताकि भारत में नीले कलर के कपड़े पहनने वाले व्यक्तियों को लन्दन की तरह भेदभाव का सामना ना करना पड़े। भारत के संविधान निर्माता ने जब ब्लू कलर के कपड़े पहने तो उसका नतीजा यह हुआ कि भारत की प्रोफेशनल सोसाइटी में ब्लू कलर के साथ लंदन जैसा भेदभाव नहीं हुआ। यहां मजदूरों को नीले रंग की यूनिफार्म नहीं पहननी पड़ती है। डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के एक मौन आंदोलन ने देश में भेदभाव की एक नई परंपरा को जन्म होने से पहले ही खत्म कर दिया।
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