बीच सत्र में परीक्षा पैटर्न बदलकर 80% के लिए शिक्षकों को धमकाने से सुधार नहीं होगा: कर्मचारी संघ
       
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बीच सत्र में परीक्षा पैटर्न बदलकर 80% के लिए शिक्षकों को धमकाने से सुधार नहीं होगा: कर्मचारी संघ

भोपाल। कक्षा एक से आठ तक अयोग्य होते हुए भी उत्तीर्ण करने के नियम "शिक्षा का अधिकार, शासन प्रशासन व आला अधिकारियों" द्वारा थोपा गया गलत निर्णय सिद्ध हुआ है। मप्र तृतीय वर्ग शासकीय कर्मचारी संघ के प्रांतीय उपाध्यक्ष कन्हैयालाल लक्षकार ने प्रेस नोट में बताया कि वर्षों पूर्व 10+2 देशभर में लागू कर प्रदेश में 10 वीं बोर्ड की गई थी। उस वक्त प्रदेश का परिणाम 15 से 20% रहा था। परिणाम सुधारने के लगातार प्रयास व परीक्षा पैटर्न को सुधार कर वर्तमान में 30% तक वैकल्पिक, रिक्त स्थान, सही-गलत, जोड़ी मिलान वाले प्रश्न शामिल किये जा रहे हैं। इसके ठीक उलट वर्षों से "पांचवी" जिला व "आठवीं" संभागीय बोर्ड परीक्षा के चलते शिक्षा का बेहतर स्तर था जो थोपे गये गलत निर्णय से रसातल में पहुँच गया है। दोष शिक्षकों के मत्थे मड़ने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है। 

बीच सत्र में बोर्ड पैटर्न केवल शासकीय विद्यालयों में लागू कर निजी विद्यालयों को मुक्त रखते हुए शिक्षकों को परीक्षा परिणाम के प्रतिशत में बांधना व पांचवीं के 30% अंक मौखिक परीक्षा के घटाकर 10% करना परीक्षा पैटर्न को बोर्ड पैटर्न में बदलकर शिक्षा के बेहतर स्तर को एक झटके में प्राप्त कर आला अधिकारी अपनी खाल बचाने का शातिराना खेल, खेल रहे है। जमीनी हकीकत से रूबरू हुए बगैर "एसी" में बैठकर नीति निर्धारण कर शिक्षकों को परीक्षा परिणाम 80 "प्रतिशत" में बांध कर जबरिया बाध्य किया जा रहा हैं जो न्यायोचित नहीं है। 

परीक्षा पद्धति में बदलाव व बोर्ड पैटर्न चरणबद्ध तरीके से तीन से पांच वर्षो में शासकीय व निजी विद्यालयों में संविधान सम्मत एक समान लागू कर ही वांछित परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं। आला अधिकारियों की हवा हवाई व दबाव की राजनीति से किसी का भला नहीं होगा। पढ़ाने वाले शिक्षकों में अनुशासनात्मक, दमनकारी व भयाक्रांत करने वाला वातावरण बनाकर शिक्षा का स्तर तो नहीं सुधारा जा सकता है। यह केवल आला अधिकारियों का शक्ति प्रदर्शन होगा जो सामजिक रूप से गलत है। आला अधिकारी अपनी जवाबदेही से बचकर शिक्षकों को टारगेट बनाने का घिनौना प्रयास कर रहे हैं, इससे शिक्षकों में आक्रोश व्याप्त है जो चिंताजनक है। माननीय मुख्यमंत्री श्रीमान कमलनाथ जी व्यवहारिक पक्ष को ध्यान में रखते हुए तुलनात्मक व न्यायसंगत निर्णय से समाधान कारक  पहल करे ताकि शिक्षा के स्तर में वांछित सुधार हो सके जो शिक्षा, शिक्षार्थी, शिक्षक व समाजोपयोगी हो।