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बजट: गलत अनुमान और पर्याप्त बजट | EDITORIAL by Rakesh Dubey

नई दिल्ली। दो चार दिन में 2020-21 का बजट आ रहा है। पिछले अनुभा यह है की गलत अनुमानों के कारण किसी मद में आवंटित धन पूरा खर्च नहीं हो सका तो किसी मद में वित्त वर्ष खत्म होने के पहले ही धन के लाले पढ़ गए | कहने को सकल कर राजस्व की तो आंकड़े भले ही अनुमान से कम रहे लेकिन तथ्य यह है कि जीडीपी की तुलना में ऐसे राजस्व का अनुपात मोदी सरकार के प्रत्येक वर्ष में बढ़ा ही है। वर्ष 2013-14 के 10.14 प्रतिशत से बढ़कर इस वर्ष इसके 11.72 प्रतिशत हो जाने की उम्मीद बात सरकार कर रही है विशेषग्य भी सहमती दिखा रहे हैं। ऐसे राजस्व लक्ष दो लाख करोड़ तय किया गया था। 

यदि यह कम भी रहता है तो भी जीडीपी के संदर्भ में यह आंकड़ा 2013-14 की तुलना में कहीं अधिक बेहतर रहेगा। जबकि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) से होने वाला संग्रह अपेक्षा से कम रहना तय है। यह सब गलत आकलन का ही नतीजा है। आर्थिक मंदी के दिनों में बजटिंग ज्यादा देखने को मिल रही है। इससे यह साफ़ होता है सरकार या तो मंदी का अनुमान नहीं लगा पाती है या फिर वह उसे देख नहीं पाती। जीएसटी के साथ तो दिक्कत है ही, लेकिन असल समस्या बजटके मामले में सरकार का जरूरत से ज्यादा महत्त्वाकांक्षी होना भी है। सर्व ज्ञात तथ्य है कि राजस्व में इजाफे का अच्छा खासा हिस्सा गैर कर स्रोतों से आया हैअर्थात सरकारी कंपनियों से अतिरिक्त लाभांश, सरकारी हिस्सेदारी कम करना, लाइसेंस शुल्क और स्पेक्ट्रम के इस्तेमाल से राजस्व, वगैरह। इस वर्ष गैर कर राजस्व के दो वर्ष पहले की तुलना में 63 प्रतिशत ज्यादा रहने की बात कही गई थी लेकिन यह लक्ष्य हासिल नहीं होगा। 

ज्यादा बजटिंग की कीमत दूरसंचार जैसे बदहाल क्षेत्र तथा अन्य और सरकारी कंपनियों को चुकानी पड़ी है। यह कीमत उन संगठनों को भी चुकानी होती है जिनका बकाया सरकार के ऊपर है लेकिन वह चुकता नहीं हो रहा। हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स इसका उदाहरण है। खाद्य निगम जैसी कंपनियों को हरसंभव जगह से उधारी लेनी पड़ रही है क्योंकि सरकार समय पर धन नहीं दे पा रही। राज्य भी समय पर केंद्रीय कर में हिस्सेदारी नहीं मिलने के कारण उसका बकाया नहीं चुका पा रहे। जरूरत से ज्यादा प्रयास करने की अपनी कीमत है जो चुकानी पड़ती है। केंद्र सरकार की तुलना में व्यापक अर्थव्यवस्था कहीं बड़ी कीमत चुकाती है क्योंकि केंद्र मनमाना व्यवहार कर के बच सकता है। इसके बाद देश के समक्ष फर्जी आंकड़े पेश कर सच को छिपा लिया जाता है। 

सही मायने में सरकार या तो मंदी का अनुमान नहीं लगा पाती है या फिर वह उसे देख नहीं पाती। उदाहरण के लिए यह समझना मुश्किल है कि सरकार ने जीडीपी की वृद्घि के लिए 7 प्रतिशत और नॉमिनल वृद्घि के लिए 12 प्रतिशत का अनुमान क्यों लगाया था जबकि जुलाई से ही हालात एकदम स्पष्ट हो चले थे। यह कोई बचाव नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन भी मंदी के प्रभाव का आकलन करने में चूक गए। हर कोई जानता है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के पूर्वानुमान में आंकड़े प्राय: गलत रहते हैं। नतीजा, अंतिम तिमाही में सरकारी क्षेत्र 15 प्रतिशत की दर से बढ़ा जबकि शेष अर्थव्यवस्था बमुश्किल 3 प्रतिशत की गति से विकसित हुई।

वैसे सरकार को वर्ष 2020-21 के बजट में राजकोषीय अनुशासन पर टिके रहना चाहिए या घाटे को भुलाकर आगे बढऩा चाहिए, जैसा सवाल एक बार फिर सामने है। इसे जीडीपी और ऋण के अनुपात के नजरिए से देखा जाना चाहिए। यह ज्यादा है और इसमें लगातार इजाफा हो रहा है। यह भी देखना होगा कि उधारी का उच्च स्तर ब्याज दरों पर क्या असर डालेगा जबकि वे पहले से अधिक हैं। यह कहा जा सकता है कि प्रति चक्रीय राजकोषीय नीति खुलेपन का संकेत देती है लेकिन हकीकत यह है कि अतीत की गलतियां अलग-अलग तरह से अपनी कीमत वसूल कर रही हैं। अब क्षतिपूर्ति का वक्त आ गया है। इसके साथ अर्थव्यवस्था से अपनी उम्मीदों को भी कम करने का वक्त नजदीक गया है। ऐसे में बजट में जरूरत से अधिक प्रयास करने से बचना चाहिए।
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
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