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मध्य प्रदेश की जितेंद्र अवस्थी की चिट्ठी को सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका माना | JABALPUR NEWS

जबलपुर। मध्य प्रदेश के जितेंद्र अवस्थी की एक चिट्ठी को सुप्रीम कोर्ट ने जनहित याचिका के रूप में स्वीकार कर लिया है। श्री अवस्थी की यह चिट्ठी हाईकोर्ट में दाखिल होने वाली चुनावी याचिकाओं की सुनवाई में लेटलतीफी के संदर्भ में थी। बता दें कि भारत के इतिहास में शायद यह पहली बार है जब एक चुनावी याचिका को जनहित याचिका मान लिया गया।

बरगी से चुनाव लड़े जितेन्द्र अवस्थी ने बताया कि मैने मध्यप्रदेश के हुऐ आम चुनावों मे अपने साथ हुऐ अन्याय को ध्यान मे रखकर मैने इस आशय के साथ कि शीघ्र मुझे न्याय प्राप्त होगा। उच्य न्यायालय मध्यप्रदेश (हाई कोर्ट) मे न्याय प्राप्ति हेतु एक चुनावी याचिका क्रमांक EP 21 /2019 दिनांक 25 जनवरी 2019 को दायर की थी किन्तु आज दिनांक 17 नवंबर तक मेरी याचिका के प्रारंभिक आवेदनो का निराकरण नही हुआ।

श्री अवस्थी ने कहा कि इस बात से परेशान होकर मे जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 /1951 की कानून की किताब खरीदी इसके अनुसार देश मे चुनावी व्यवस्था व याचिकाओ का निर्धारण होता है। महोदय किताब के गहन अध्ययन के बाद मैने यह पाया कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 /1951 के नियम 86 के उपनियम 6 के अनुसार किसी भी चुनावी याचिका मे उसके निर्णय तक प्रतिदिन सुनवाई होनी चाहिए और यदि एक दिन से अधिक इसको आगे बढ़ाया जाता है तो उच्य न्यायालय को इन्हे अभिलिखित करना होगा। इसी के उपनियम 7 के अनुसार हर निर्वाचन अर्जी शीघ्रता से विचारित की जायेगी एवं उच्य न्यायालय मे विचारण के लिए उपस्थित होने की दिनांक से 6 माह मे निराकरण किया जायेगा। 

इस बात को पढकर मैने माननीय सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश महोदय को एक पत्र लिखा कि देश मे चुनावी याचिका हास्य का पात्र बन गई हैं क्योंकि जन सामान्य के मन में यह बात स्थापित है इनमे निर्णय तब होता है अवैधानिक तरीके से निर्वाचित व्यक्ति अपने 5 वर्ष के संविधानिक अधिकारो को भोग कर आनंद करता है और इसके बाद अगर याचिकाकर्ता के आवेदन को न्यायालय उचित मान कर चुनाव अवेध घोषित कर भी दे तो इसका याचिकाकर्ता के लिए कोई औचित्य नहीं रहा जाता तब तक दूसरा चुनाव हो जाता है और याचिकाकर्ता जिसके साथ अन्याय हुआ वह केवल हास्य का पात्र बनकर रह जाता है और उसे व्यक्तिगत बुराई, सामाजिक परिहास, राजनैतिक दुश्मनी, दबाव बनाने याचिका वापसी हेतू दर्ज झूठे मुकदमें,धन वा समय की बर्बादी के साथ निराशा भी मिलती है।

तो क्या यही भारतीय न्याय व्यवस्था है जहा कानून के अनुसार चुनावी याचिकाओ का निर्धारण नहीं होता। तो क्या यह संविधान के साये वे बने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 /1951 का अपमान नही और यदि है तो क्या देश की न्याय पालिका संविधान की अवहेलना कर रही है।
मेरा न्याय मे विश्वास तब बढ गया जब इस हेतु पूरे ब्योरा के साथ मैने माननीय सुप्रीम को के मुख्य न्यायाधीश महोदय को एक पत्र लिखा और उपरोक्त बातोें का विस्तार से विष्लेषण किया तथा मेरे पत्र पर संज्ञान ले माननीय सुप्रीम कोर्ट ने न्यायालय इस पर गंभीर रुख अपनाते हुऐ इसे जनहित याचिका डायरी क्रमाक 57821/eci/(E)2019 के रूप मे दर्ज कर लिया।

ये देश का पहला विषय है जब किसी चुनावी याचिकाकर्ता ने जो कम पढा लिखा है, ने कानून की किताब खरीद कर पढी और विवेक से सीधे मुख्य न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिख न्याय की गुहार लगाई वा माननीय सुप्रीम कोर्ट ने इसे जनहित याचिका के रूप मे स्वीकार कर लिया।

श्री अवस्थी कहते हैं कि मेरा आशय अब ना केवल स्वयं के लिए कानूनन निर्धारित अवधि मे न्याय प्राप्त करना है बल्कि एक बेहद महत्वपूर्ण चुनावी याचिका के विषय मे हो रही अंधेरगर्दी पर देश की सर्वोच्य न्याय पालिका वा न्याय व्यवस्था और देश की सरकार का ध्यान आकर्षित करना है ताकि मेरे साथ साथ उन सभी लोगों को न्याय मिले जो कानूनन कार्यवाई ना होने से न्याय से अथवा संविधानिक प्रदत्त  मोलिक अधिकारोें से वंचित रह जाते है।