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LIC ने 14 साल तक बीमाधारक की विधवा को परेशान किया, आयोग ने क्लेम दिलाया

नई दिल्ली। भारत की सबसे बड़ी बीमा कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम ने एक विधवा महिला को मात्र 1.5 लाख रुपए के क्लेम के लिए 14 साल तक परेशान किया। विधवा महिला को राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निपटान आयोग (एनसीडीआरसी) केस लड़ना पड़ा। आयोग ने एलआईसी को आदेश दिया है कि वो बीमा धारक की उत्तराधिकारी विधवा पत्नी को बोनस और ब्याज के साथ 1.5 लाख रुपए का भुगतान करे। 

मामला क्या है

सुनीता देवी के पति नरेंद्र कुमार पांडेय ने 25 नवंबर, 1997 को एक लाख रुपए और 50,000 रुपए की दो बीमा पॉलिसियां ली थीं। पैसे की दिक्कत की वजह से ये पॉलिसियां बंद हो गई थीं। 19 जून, 2002 को इन्हें फिर शुरू किया गया। सुनीता के पति का निधन 24 मई, 2005 को हुआ था। बाद में नॉमिनी के रूप में सुनीता ने दोनों पॉलिसियों के लिए दावा किया। 

LIC ने मजबूरी का फायदा उठाने की कोशिश की

एलआईसी ने एक लाख रुपए की पॉलिसी पर सिर्फ 34,300 रुपए और 50,000 रुपए की पॉलिसी पर सिर्फ 10,750 रुपए का दावा मंजूर किया। कंपनी ने दलील दी कि बीमित ने पॉलिसी को दोबारा चालू करते समय अपनी बीमारी के बारे में जानकारी नहीं दी थी। 

POLICY HOLDER ने किडनी ट्रांसप्लांट के लिए दावा भी किया था

सुनीता देवी ने कहा कि उनके पति का गुर्दा प्रत्यारोपण वर्ष 2000 में हुआ था। उस समय उनके पति ने इसके लिए दावा भी किया था। पॉलिसियों को फिर से शुरू करते समय बीमा कंपनी को पांडेय के गुर्दा प्रत्यारोपण की पूरी जानकारी थी।

NCDRC ने फैसले में क्या कहा

आयोग ने अपने आदेश में कहा कि बीमा कंपनी ने पांडेय द्वारा पॉलिसी लेते समय बीमारी के बारे में छिपाने को लेकर कोई अपील नहीं की है। आयोग ने कहा कि मौजूदा मामले में बीमा कंपनी ने इस बारे में कोई दलील नहीं दी कि बीमित द्वारा दो बीमा पॉलिसियां लेते समय उसने अपनी बीमारी के बारे में जानकारी नहीं दी थी। आयोग की पीठासीन सदस्य दीपा शर्मा और सदस्य सी विश्वनाथ की पीठ ने यह आदेश दिया।