MP NEWS: दर्जन भर मंत्रियों की सीट खतरे में

15 September 2018

भोपाल। मंत्रीमंडल किसी भी मुख्यमंत्री की ताकत होता है परंतु मध्यप्रदेश में सीएम शिवराज सिंह के एक दर्जन मंत्री ऐसे हैं जो ताकत के बजाए कमजोरी बन गए हैं। इनकी सीट खतरे में हैं। इनकी विधानसभा में इनका जबर्दस्त विरोध हो रहा है। इनमें से कुछ तो ऐसे हैं जिनका टिकट भी कटना तय हो गया है। शेष बचे मंत्रियों में से कुछ ने केवल अपनी विधानसभा पर फोकस कर दिया है। वो आसपास की सीटें जिताने की स्थिति में भी नहीं हैं। मात्र 4 मंत्री ऐसे हैं जिन्हे कद्दावर कहा जा सकता है। जिनका अपनी विधानसभा के अलावा भी प्रभाव है और जो चुनाव में शिवराज सिंह को फायदा दिला सकते हैं।

पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने सभी मंत्रियों को निर्देश दिए थे कि वे खुद के अलावा पड़ोस की सीट पर भी भाजपा की जीत की जिम्मेदारी लें लेकिन फिलहाल हालात यह हैं कि मंत्री अपनी ही सीट नहीं बचा पा रहे हैं। सीएम शिवराज सिंह सभी 230 सीटों पर जन आशीर्वाद यात्रा लेकर वोट मांगने निकले हैं। शुरूआती दौर में यात्रा में भारी भीड़ भी देखी गई थी लेकिन अब वो बात नजर नहीं आ रही है। भाजपा से जुड़े नेताओं का कहना है कि इस यात्रा के जरिए कई विधायकों की डूबती नैया को सहारा मिल गया है। 

इन मंत्रियों की हालत पतली
लालसिंह आर्य- फोरलेन सड़क, सिंध का पानी लाने की योजना सहित 110 करोड़ की पेयजल योजना पूरी न होने से नाराजगी।
माया सिंह- पिछला चुनाव मात्र 1200 वोटों से जीती थीं। स्थानीय विरोध के चलते चुनाव लड़ने की इच्छुक नहीं हैं।
जयभान सिंह पवैया- लोगों और कार्यकर्ताओं से व्यवहार में तल्खी से नाराजगी है।
गौरीशंकर बिसेन- मेडिकल कॉलेज, सरेखा में ओवरब्रिज की घोषणा की थी। वादा अधूरा रहा। आय से अधिक संपत्ति का मामला हाई कोर्ट में।
सूर्यप्रकाश मीणा- विवादों में घिरने से छवि खराब। बेटे की वजह से कार्यकर्ताओं में नाराजगी।
बालकृष्ण पाटीदार: जनता से दूरी। मंत्री होने के बाद भी क्षेत्र में बड़ा विकास कार्य नहीं कर पाए। किसान भी नाराज।
शरद जैन- संवादहीनता के कारण कार्यकर्ता और जनता दोनों नाराज।
डॉ. गौरीशंकर शेजवार- 2008 में चुनाव हार चुके हैं। अब एंटीइनकमबेंसी के चलते बेटे मुदित शेजवार का नाम टिकट के लिए आगे बढ़ा रहे हैं।
रुस्तम सिंह- जातिवाद की छाप और गैर गुर्जर जातियों में असंतोष। 2008 में हार गए थे।
कुसुम महदेले- स्थानीय स्तर पर कोई काम नहीं किए। सिर्फ जातिगत वोट ही मुख्य आधार।
रामपाल सिंह- पुत्रवधु द्वारा आत्महत्या करने से रघुवंशी समाज में नाराजगी।
ओमप्रकाश धुर्वे- पत्थरगड़ी के विरोध से समाज ने हुक्कापानी बंद करवा दिया था।
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