भारत में 100 साल पहले शुरू हुआ था आरक्षण, पढ़िए कहां लागू हुआ था सबसे पहले | NATIONAL NEWS

28 August 2018

लॉरेंस मिल्टन/मैसूर। देश में इन दिनों आरक्षण का स्वरूप बदलने की वकालत की जा रही है। कहा जा रहा है कि आरक्षण जाति के आधार पर नहीं बल्कि आर्थिक आधार पर होना चाहिए। आइए आरक्षण का इतिहास जानते हैं। 100 साल पहले सबसे पहला आरक्षण, कहां, किसको और क्यों दिया गया था। क्या आरक्षण प्रशासन के सभी पदों पर था या केवल कुछ विशेष पदों पर। 

100 साल पहले भारत में आरक्षण नीति की दिशा में पहला बड़ा कदम मैसूर से उठाया गया था। वह तारीख थी 23 अगस्त 1918, तब मैसूर रियासत हुआ करती थी और महाराजा नालवाडी कृष्णराजा वाडियार का शासन था। इसी रियासत में सबसे पहले सरकारी सेवाओं में सभी समुदाय के सदस्यों को आरक्षण देने की संभावनाएं तलाशने के लिए एक कमिटी गठित कर इतिहास रचा गया था।   

उस समय रियासत के प्रशासन में ब्राह्मणों का वर्चस्व हुआ करता था। ऐसे समय में अविभाजित भारत में इस कदम को सरकारी सेवाओं में जाति के आधार पर आरक्षण की दिशा में उठाया गया पहला बड़ा प्रयास माना जाता है। कृष्णराजा वाडियार के समय में तत्कालीन चीफ कोर्ट ऑफ मैसूर के चीफ जज, सर लेसली मिलर की अध्यक्षता वाली कमिटी ने महत्वपूर्ण सिफारिश की थी। 

सभी जातियों को सरकारी नौकरी में समान अवसर के लिए था आरक्षण
नालवाडी ने कमिटी को गठित कर रियासत में गैरब्राह्मणों के आंदोलन का एक तरह से समर्थन किया था। इससे संबंधित आदेश में जिक्र किया गया था कि सरकारी सेवाओं में ब्राह्मणों का दबदबा काफी ज्यादा है और स्टेट की मंशा यह है कि दूसरे समुदायों को भी बराबर का प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। इसके लिए भर्ती प्रक्रिया में जरूरी बदलाव के लिए कदम उठाने की बात कही गई थी। 

मैसूर के ब्राह्मणों ने किया था विरोध 
इस आदेश में वंचित तबकों को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष दर्जा देने का जिक्र था और ऐसे उपाय किए जाएं जिससे इनका प्रतिनिधित्व बढ़े। इतिहासकार पीवी नंजराज उर्स बताते हैं, 'चूंकि मैसूर रियासत पर मद्रास प्रेजिडेंसी के अधिकारियों का नियंत्रण था, ब्रिटिश अफसरों ने मद्रासी ब्राह्मणों को दीवान नियुक्त किया था। इसका विरोध सबसे पहले मैसूर के ब्राह्मणों ने किया था, जो किसी प्रकार की वरीयता दिए जाने के खिलाफ थे।' 1912 में एम विश्वेश्वरैया को मैसूर का दीवान नियुक्त किए जाने के बाद यह विवाद ठंडा पड़ गया था। 

अच्छे प्रशासन के लिए प्रतिभाशाली लोगों की वकालत 
कुछ समय बाद वोक्कालिगा और लिंगायत संगठनों के नेतृत्व में गैरब्राह्मणों ने ब्राह्मणों के एकाधिकार को चुनौती दी और सरकारी सेवा में वरीयता दिए जाने की मांग की। 1916 के आसपास उन्होंने तत्कालीन शासक कृष्णराजा वाडियार के समक्ष अपनी बात रखी। विश्वेश्वरैया ने प्रशासन में प्रतिभाशाली लोगों के होने की वकालत की। उन्होंने कहा कि इससे गवर्नेंस की क्षमता बढ़ेगी। इसके साथ ही उन्होंने सुझाव दिया कि पिछड़े वर्गों के लोगों को शिक्षित करने के लिए स्कूल खोले जाने चाहिए। महाराजा और दीवान के बीच आरक्षण के मसले पर कई पत्रों का आदान-प्रदान किया गया। बाद में महाराजा ने मांगों का सम्मान करते हुए एक कमिटी का गठन किया और नवनियुक्त दीवान कंठराज उर्स को उचित कार्रवाई करने को कहा। 

करीबियों से राय लेकर राजा ने कराई स्टडी 
इतिहासकार चानुर कुमार विस्तार से बताते हैं कि गैरब्राह्मणों की बात सुनने के बाद महाराजा ने कमिटी गठित करने से पहले दो दिन का समय लिया था। इस दौरान महाराजा ने अपने करीबी सलाहकारों की राय ली और एक स्टडी कराई। कुमार बताते हैं कि अगस्त 1918 में कमिटी गठित करने से पहले ऐसा लगता है कि वह राजी हो गए थे। 

कौन-कौन था कमिटी में? 
इस कमिटी में अलग-अलग समुदायों के 6 लोग शामिल थे, जो अधिकारी नहीं थे। इसमें ब्राह्मण, लिंगायत, वोक्कालिगा, मुस्लिम और पिछड़े वर्ग के प्रतिनिधि शामिल थे। कमिटी के चेयरमैन सर मिलर थे। कमिटी ने मई 1919 में अपनी रिपोर्ट सौंपी और रियासत को सुझाव दिया कि 7 साल से कम समय के लिए, राज्य के सभी विभागों में पिछड़े समुदाय के सदस्यों का प्रतिनिधित्व धीरे-धीरे 50 फीसदी बढ़ाया जाना चाहिए। कहा गया था कि तब तक वे निर्धारित योग्यता हासिल कर लेंगे। 

इतिहासकार बताते हैं कि कृष्णराजा वाडियार के इस प्रयास को संपूर्ण भारत में पहली बार बड़े पैमाने पर सरकारी सेवाओं में आरक्षण की शुरुआत करनेवाले के तौर पर जाना जाता है। मैसूर स्टेट के मैसूर रेप्रिज़ेंटटिव असेंबली गठित करने के 4 दशकों के बाद ऐसा हुआ था, जिसमें विभिन्न वर्गों के लोगों के हिसाब से नीतियां बनीं। यह 1880 का दौर था जब महाराजा चामराजा वाडियार ने एक ऐसी संस्था का गठन किया जो भारत में प्रतिनिधियों की पहली संस्था बनी, जिसकी सरकार के कामकाज में बड़ी भूमिका थी। 
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