कभी पूरा नहीं बन पाया भोजपुर मंदिर का शिखर। MP NEWS

29 July 2018

सावन माह आते ही पूरा भारत हर-हर महादेव की आवाज से गूंजने लगता है। भगवान शिव को देवों के देव महादेव कहा जाता है। महादेव, भोलेनाथ, शंकर, महेश, रुद्र, नीलकंठ आदि नामों से प्रचलित भगवान शिव हिन्दू धर्म के 33 करोड़ देवी देवताओं में प्रमुख देवता माने जाते हैं। वेदों में इनका नाम रूद्र कहा गया है। आज शिवजी को नमन करते हुए एक ऐसे शिवलिंग की बात करते हैं जो देश का हृदय कहे जाने वाले राज्य मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित है भोजपुर नामक एक स्थान। यहां स्थापित है एक प्रसिद्ध मध्यकालीन शिव मंदिर है, जो भोजेश्वर शिव मंदिर के नाम विख्यात है।

भोजपुर मध्य प्रदेश के विदिशा से ४५ मील की दूरी पर रायसेन जिले में वेत्रवती नदी के किनारे बसा है। प्राचीन काल का यह नगर "उत्तर भारत का सोमनाथ' कहा जाता है। गाँव से लगी हुई पहाड़ी पर एक विशाल शिव मंदिर है। इस नगर तथा उसके शिवलिंग की स्थापना धार के प्रसिद्ध परमार राजा भोज (१०१० ई.- १०५३ ई.) ने किया था। अतः इसे भोजपुर मंदिर या भोजेश्वर मंदिर भी कहा जाता है वर्तमान में लोग भले ही भोजपुर को बहुत कम जानते हैं, लेकिन मध्यकाल में इस नगर की प्रसिद्धि काफी दूर-दूर तक फैली थी। इस नगर को धार के राजा भोज ने स्थापित करवाया था। जी हां, उसी राजा भोज ने जिसके बारे में प्रसिद्ध लोकोक्ति "कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली" कही-सुनी जाती है।

गाँव से लगी हुई पहाड़ी पर एक विशाल शिव मंदिर है। इस नगर तथा उसके शिवलिंग की स्थापना धार के प्रसिद्ध परमार राजा भोज (१०१० ई.- १०५३ ई.) ने किया था। अतः इसे भोजपुर मंदिर या भोजेश्वर मंदिर भी कहा जाता है। मंदिर पूर्ण रुपेण तैयार नहीं बन पाया। इसका चबूतरा बहुत ऊँचा है, जिसके गर्भगृह में एक बड़ा- सा पत्थर के टूकड़े का पॉलिश किया गया लिंग है, जिसकी ऊँचाई ३.८५ मी. है। इसे भारत के मंदिरों में पाये जाने वाले सबसे बड़े लिंगों में से एक माना जाता है। विस्तृत चबूतरे पर ही मंदिर के अन्य हिस्सों, मंडप, महामंडप तथा अंतराल बनाने की योजना थी। ऐसा मंदिर के निकट के पत्थरों पर बने मंदिर- योजना से संबद्ध नक्शों से इस बात का स्पष्ट पता चलता है। इस मंदिर के अध्ययन से हमें भारतीय मंदिर की वास्तुकला के बारे में बहुत- सी बातों की जानकारी मिलती है। भारत में इस्लाम के आगमन से भी पहले, इस हिंदू मंदिर के गर्भगृह के ऊपर बना अधुरा गुम्बदाकार छत भारत में ही गुम्बद निर्माण के प्रचलन को प्रमाणित करती है। भले ही उनके निर्माण की तकनीक भिन्न हो। कुछ विद्धान इसे भारत में सबसे पहले गुम्बदीय छत वाली इमारत मानते हैं। इस मंदिर का दरवाजा भी किसी हिंदू इमारत के दरवाजों में सबसे बड़ा है। चूँकि यह मंदिर ऊँचा है, इतनी प्राचीन मंदिर के निर्माण के दौरान भारी पत्थरों को ऊपर ले जाने के लिए ढ़लाने बनाई गई थी। इसका प्रमाण भी यहाँ मिलता है। मंदिर के निकट स्थित बाँध को राजा भोज ने बनवाया था। बाँध के पास प्राचीन समय में प्रचूर संख्या में शिवलिंग बनाया जाता था। यह स्थान शिवलिंग बनाने की प्रक्रिया की जानकारी देता है। कुछ बुजुर्गों का कहना हैै कि मंदिर का निर्माण द्वापर युग में पांडवों द्वारा माता कुंती की पूजा के लिए इस शिवलिंग का निर्माण एक ही रात में किया गया था। विश्व प्रसिद्घ शिवलिंग की ऊंचाई साढ़़ेे इक्कीस फिट, पिंडी का व्यास १८ फिट आठ इंच व जलहरी का निर्माण बीस बाई बीस से हुुआ हैै। इस प्रसिद्घ स्थल पर साल में दो बार वार्षिक मेले का आयोजन किया जाता हैै। जो मंकर संक्रांति व महाशिवरात्रि पर्व होता हैै। एक ही पत्थर से निर्मित इतनी बड़़ी शिवलिंग अन्य कहीं नहीं दिखाई देती हैै। इस मंदिर की ड्राइंंग समीप ही स्थित पहाड़़ी पर उभरी हुुई हैै जो आज भी दिखाई देती हैै। इससे ऐेसा प्रतीत होता हैै कि पूर्व में भी आज की तरह नक्शे बनाकर निर्माण कार्य किए जाते रहेे होंगे। इस मंदिर के महंत पवन गिरी गोस्वामी ने बताया कि उनकी यह १९ वीं पीढ़़ी हैै जो इस मंंदिर की पूजा अर्चना कर रही हैै। उन्होंने बताया शिवरात्रि पर्व पर भगवान भोलेनाथ का माता पार्वती से विवाह हुुआ था। अत: इस दिन महिलाएं अपनी मनोकामना के साथ व्रत रखती हैै व भगवान भोले नाथ के पांव पखारने यहां आती है। माता कुुंती के पिता का नाम भी राजाभोज था अत: इसका नाम भोजपुर पड़़ा व यह द्वापर युग का निर्मित मंदिर हैै व जीर्णशीर्ण होने पर धार के राजा परमार वंशी राजाभोज ने इसका जीर्णोद्घार कराया। यहां शिवरात्रि पर्व पर करीब एक लाख श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैैँँ।

इस मध्यकालीन नगर को प्रसिद्धि दिलाने मुख्य श्रेय भोजपुर के भोजेश्वर शिव मंदिर और यहां निर्मित एक विशाल झील का था। राजा भोज द्वारा बनवाए गए इस मंदिर की प्रसिद्धि 'उत्तर के सोमनाथ मंदिर' के रूप में थी।वर्तमान में भोजेश्वर शिव मंदिर जीर्णशीर्ण अवस्था में है, लेकिन झील पूरी तरह सूख चुकी है। इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग काफी आकर्षक है। 

रहस्य: कभी पूरा नहीं बन पाया मंदिर का शिखर/Mystery: Never Completed, The Pinnacle of the Temple

शिवलिंग की ऊंचाई 7.5 फीट और परिधि 17.8 फीट है, जो स्थापत्य कला का एक बेमिसाल नमूना है। यह शिवलिंग एक वर्गाकार और विस्तृत फलक वाले चबूतरे पर त्रिस्तरीय चूने-पत्थर की पाषाण-खंडों पर स्थापित है। कहते हैं इस मंदिर का शिखर निर्माण का काम कभी भी पूर्ण नहीं हो सका था। शिखर को पूरा करने के लिए जो भी प्रयास किए गए, उसके अवशेष अब भी यहां बड़े-बड़े पत्थर के रूप में बिखड़े हुए हैं। मंदिर का शिखर क्यों नहीं बन पाया इस रहस्य को कोई नहीं जानता है। 

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