badrinath-divine-katha - श्री बदरीनाथ महात्म्य कथा : Sacred Story of India's Holiest Himalayan Shrine

Updesh Awasthee
अथ मंगलाचरणम्
- दोहा: नारायणं नमस्कृत्यं, नरं चैव नरोत्तमम्। देवी सरस्वतीं व्यासं, ततो जयमुदीरयेत्॥ अलकनंदा तीर पर, बिराजे श्री भगवान। बदरी विशाल जय जय प्रभु, राखो सबकी आन॥

अथ प्रथमोऽध्यायः 

कलयुग के प्रारंभ में, हिमालय की कंदराओं में तप कर रहे के ऋषियों ने देवर्षि नारद जी से पूछा, "हे प्रभु! कलयुग में जो मनुष्य जीवन में किसी भी कारण से कठोरता तप, परिवार जनों के साथ कथाओं का आयोजन, इत्यादि नहीं कर पाते, क्या उनको पापों से मुक्ति और मोक्ष प्राप्त नहीं होग?, कृपया कोई ऐसा उपाय बताइए ताकि जीवन के अंतिम समय में भी यदि श्रद्धा जागृत होती है तो वह मनुष्य पापों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त हो सके
तब देवर्षि नारद जी बोले - हे ऋषियों! भगवान विष्णु का बदरीनाथ धाम समस्त तीर्थों में श्रेष्ठ है।
लोक में यह सत्य कहा गया है कि 'जो जाए बदरी, वो ना आए ओदरी', अर्थात् जो मनुष्य इस धाम के दर्शन कर लेता है, उसे पुनः माता के गर्भ में नहीं आना पड़ता। अर्थात् दर्शन मात्र से उसे समस्त पापों से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त हो जाता है।
चौपाई: कलयुग पाप पुंज सब नाशा। बदरी दरस मिटे सब पासा॥ 
शालिग्राम शिला सुखकारी। ध्यान मुद्रा प्रभु की अति प्यारी॥
है ऋषियों!, यह विग्रह, मानव निर्मित नहीं, अपितु स्वयंभू है जो साक्षात् शालिग्राम शिला से प्रकट हुआ है।

अथ द्वितीयोऽध्यायः 

देवर्षि नारद जी बोले - हे ऋषियों! यह स्थान पूर्व काल में भगवान शिव और माता पार्वती का निवास था। एक बार श्री हरि विष्णु ने बालक का रूप धरा और द्वार पर रोने लगे। माता पार्वती का हृदय बालक की करुणा देख द्रवित हो गया और उन्होंने बालक को आश्रम के भीतर स्थान दे दिया। कुछ समय बाद बालक ने भीतर से द्वार बंद कर लिए। महादेव को तो पहले से ही सब कुछ ज्ञात था। इसलिए उन्होंने यह स्थान भगवान श्री हरि विष्णु को प्रदान किया और स्वयं माता पार्वती सहित केदारनाथ चले गए। इस प्रकार केदारनाथ में महादेव, माता पार्वती के साथ और बद्रीनाथ में भगवान श्री हरि विष्णु, माता लक्ष्मी के साथ विराजमान हैं।
दोहा: बाल रूप धरि हरि तहाँ, कीन्हीं अचरज लील। 
शिव इच्छा सों बसि गये, पावन बदरी छील॥

अथ तृतीयोऽध्यायः 

एक समय देवी लक्ष्मी भगवान विष्णु से रुष्ट होकर चली गईं। तब श्री हरि उन्हें मनाने और घोर तपस्या करने हेतु हिमालय के इस वन में चले आए। उस समय यहाँ बदरी (जंगली बेर) के विशाल जंगल थे। जब लक्ष्मी जी की नाराजगी दूर हुई और वे प्रभु को खोजते हुए वहाँ पहुँचीं, तो देखा कि भगवान बदरी के वृक्ष के नीचे ध्यानमग्न हैं। तब देवी लक्ष्मी ने ही प्रभु को 'बदरीनाथ' नाम से पुकारा। इस प्रकार यहां पर भगवान विष्णु का नाम बद्रीनाथ पड़ गया। हजारों वर्षों से पृथ्वी पर निवास करने वाले समस्त वैष्णव जन यहां पर भगवान श्री हरि विष्णु को, बिल्कुल उसी प्रकार प्रेम पूर्वक "बद्रीनाथ" नाम से पुकारते हैं जैसे माता पार्वती ने पुकारा था।
चौपाई: बदरी वन प्रभु कीन्हि तपस्या। लक्ष्मी जी सब मिटि गई समस्या॥ 
विष्णु चरण पखारति गंगा। अलकनंदा बहति अनंगा॥
यहाँ अलकनंदा नदी निरंतर बहते हुए भगवान के चरणों को पखारती रहती है।

अथ चतुर्थोऽध्यायः 

देवर्षि आगे बोले - कालान्तर में बौद्ध धर्म के प्रभाव के कारण भगवान की यह दिव्य मूर्ति मेरे कुंड में सुरक्षित कर दी गई थी। 8वीं शताब्दी में जब जगद्गुरु आदि शंकराचार्य बदरीकाश्रम पहुँचे, तो मैंने उन्हें दिव्य प्रेरणा दी। उन्होंने नारद कुंड में गोता लगाया और मैंने उनके हाथ में भगवान की चतुर्भुज मूर्ति रख दी।
दोहा: नारद कुंड सों मूर्ति कढ़ी, संकर अति हरषाय। 
गरुड़ गुफा ढिग राखि प्रभु, पूजन विधि ठहराय॥
शंकराचार्य जी ने ही यह परंपरा स्थापित की कि यहाँ के मुख्य पुजारी ने अपने ही संप्रदाय के (रावल) दक्षिण भारतीय नंबूदरीपाद ब्राह्मण ही होंगे। 

अथ पंचमोऽध्यायः 

महाभारत युद्ध के पश्चात जब पांडव अपनी अंतिम यात्रा पर निकले, तो उन्होंने इसी पावन धाम में भगवान के दर्शन किए। यहाँ से वे माणा गाँव और स्वर्गारोहिणी मार्ग से हिमालय की ओर बढ़े, इसीलिए इसे स्वर्ग का द्वार भी कहा जाता है। शीतकाल में जब छह महीने कपाट बंद रहते हैं, तब यहाँ देवर्षि नारद और अन्य देवता आकर पूजा करते हैं।
चौपाई: पांडव स्वर्ग द्वार यहि माना। नारद मुनि हरि ध्यान लगाना॥
जो जन कथा प्रेम सों गावे। अंत समय वैकुंठ सिधावे॥
जो भी मनुष्य इस बदरीनाथ माहात्म्य की कथा को श्रद्धापूर्वक सुनता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और वह अंत में विष्णु लोक को प्राप्त होता है। पृथ्वी पर यह एकमात्र ऐसा स्थान है जहां पर माता पार्वती का वात्सल्य, महादेव की करोड़ों वर्ष की तपस्या का अंश, श्री हरि विष्णु का आशीर्वाद और माता लक्ष्मी की कृपा एक साथ प्राप्त होती है।
॥ इति श्रीमदाचार्योपदेशावस्थिविरचितं श्रीबदरीनाथधाममाहात्म्यकथासम्पूर्णम् ॥
॥ बोलो श्री बदरी विशाल लाल की जय ॥

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