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FIR के कारण कर्मचारी की पेंशन और ग्रेच्युटी नहीं रोक सकते: हाईकोर्ट | EMPLOYEE NEWS

27 February 2018

जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जेके माहेश्वरी ने अपने एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्घांत प्रतिपादित करते हुए कहा कि सिर्फ एफआईआर सेवानिवृत्त कर्मचारी के देय स्वत्वों पेंशन और ग्रेच्युटी आदि रोकने का आधार नहीं बनाई जा सकती। लिहाजा, याचिकाकर्ता के खिलाफ लोकायुक्त द्वारा कार्रवाई किए जाने के आधार पर उसकी पेंशन, ग्रेच्युटी आदि रोकना सर्वथा अनुचित है। आदेश दिया जाता है कि याचिकाकर्ता को 2 माह के भीतर 7 फीसदी वार्षिक ब्याज की दर से समस्त स्वत्वों का भुगतान सुनिश्चित किया जाए।

मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता सतना निवासी सेवानिवृत्त सहायक श्रम पदाधिकारी अरुण कुमार पाण्डेय की ओर से अधिवक्ता राहुल मिश्रा ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि रीवा में पदस्थापना के दौरान विशेष स्थापना पुलिस लोकायुक्त रीवा संभाग ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत प्रकरण कायम किया था। यह कदम याचिकाकर्ता के अधीनस्थ श्रम निरीक्षक को 8 जनवरी 2016 को लोकायुक्त टीम द्वारा ट्रेप करने के बाद उसी सिलसिले में याचिकाकर्ता को भी सह अभियुक्त बनाते हुए उठाया गया था। इसी आधार पर 31 जनवरी 2016 को सेवानिवृत्ति के बाद सभी क्लेम महज इस आधार पर रोक दिए गए क्योंकि लोकायुक्त ने प्रकरण कायम किया था। जब तक उस केस में फैसला नहीं आ जाता तब तक न पेंशन मिलेगी और न ही ग्रेच्युटी आदि राशियां।

सिर्फ राज्यपाल को है पेंशन रोकने का अधिकार
अधिवक्ता राहुल मिश्रा ने दलील दी कि पेंशन रोकने का अधिकार सिर्फ राज्यपाल को है और पेंशन नियम-1976 के नियम-9 के उपनियम-6 (बी) के अंतर्गत मामले के विचारण के लिए सक्षम न्यायालय के समक्ष लोकायुक्त स्थापना द्वारा चालान पेश नहीं किया गया है। लिहाजा, याचिकाकर्ता के मामले में दंड प्रक्रिया संहिता-1973 की धारा-2 (आई) के अनुसार मामला न्यायिक प्रक्रिया की श्रेणी में नहीं आता।



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