
प्रदेश के समस्त सामान्य, पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक वर्ग के शासकीय सेवकों की ओर से संस्था आपसे निवेदन करती है कि शासन द्वारा बनाये जा रहे (अथवा संशोधित किये जा रहे) नियम तब तक प्रभावशील न किये जावे जब तक कि मान सर्वोच्च न्यायालय में शासन द्वारा दायर अपील का अंतिम निराकरण नहीं हो जाता।
मान सर्वोच्च न्यायालय के अंतिम निर्णय के पूर्व ही शासन द्वारा कोई भी नए नियम प्रभावशील करने अथवा पुराने नियमों में किसी भी प्रकार का संशोधन करने का आशय यह हुआ कि शासन स्वयं मानता है कि “मप्र पदोन्नति नियम 2002” संविधान सम्मत नहीं हैं। यदि ऐसा है तो संस्था अपील करती है कि मान सर्वोच्च न्यायालय से सरकार अपील वापिस लेकर मान उच्च न्यायालय जबलपुर के आदेश का तत्काल पालन करे और असंवैधानिक नियमों का लाभ देकर पदोन्नत किये गये समस्त अनु. जाति/ जनजाति वर्ग के सेवकों को पदावनत कर वरिष्ठता अनुसार सामान्य, पिछड़ा व अल्पसंख्यक वर्ग के सेवकों की पदोन्नतियों की कार्यवाही प्रारम्भ की जावे।
मप्र पदोन्नति नियम 2002” के आधार पर आकल्पित बैकलॉग पूरी तरह असंगत है। अतः आकलित बैक्लॉग पदों की पूर्ति की कोई भी कार्यवाही असंवैधानिक एवं ग़लत है। निवेदन है कि मान सर्वोच्च न्यायालय के अंतिम आदेश तक बैक्लॉग पदों की पूर्ति की समस्त कार्यवाही स्थगित रखी जावे।
विगत मई 2016 से प्रतिमाह शासकीय सेवकों की सेवनिवृत्ति से ख़ाली हो रहे पदों पर अधिकांश उन अनु जाति/ जनजाति वर्ग के अधिकारियों को ही प्रभार दिये जा रहे हैं, जिनकी उन पदों पर पदस्थापना ही अस्तित्वहीन है जहाँ वे मूलरूप से पदस्थ हैं। ऐसे में दो महत्वपूर्ण पदों का कार्यभार किसी संदिग्ध सेवक को सौंपे जाने से लिए जाने वाले निर्णय भी कहाँ तक तर्कपूर्ण और सही होंगे, इस पर ही प्रश्नचिन्ह खड़ा होता है।
शासन और प्रशासन की निगाह में तंत्र के अंतर्गत कार्यरत उसके सभी सेवक समान होते हैं लेकिन विगत 15-वर्षों से सामान्य, पिछड़ा व अल्पसंख्यक वर्ग के सेवकों के प्रति शासन द्वारा किये जा रहे व्यवहार से यह लगता है कि इन वर्गों के शासकीय सेवक दोयम दर्जे के सेवक हैं।