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BJP OFFER TO NITISH KUMAR: आ लौट के आजा...

10 July 2017

पटना। बिहार में लालू यादव के ऊपर सीबीआई की कार्रवाई के बाद अब राजनीति तेज हो गई। नीतीश पर विपक्ष तेजस्वी से इस्तीफा लेने के लिए दवाब बना रही है। वहीं, आरजेडी की मीटिंग के बाद लालू के नेताओं ने साफ कर दिया है कि तेजस्वी इस्तीफा नहीं देंगे। इसी बीच बीजेपी ने नीतीश कुमार को ऑफर दिया है कि वे लालू यादव को छोड़कर अलग होते हैं तो बीजेपी बाहर से सरकार को समर्थन देगी। 

यह बयान बिहार बीजेपी के अध्यक्ष नित्यानंद राय ने दिया है। दरअसल, महागठबंधन में खटपट शुरू होने के बाद से ही यह कयास लगाया जा रहा था कि नीतीश अगर आरजेडी व कांग्रेस से अलग होते हैं तो बीजेपी साथ दे सकती है। बीजेपी के इस ऑफर के बाद सबकी निगाहें अब नीतीश कुमार की मीटिंग पर टिकी हुई है। नीतीश ने मंगलवार को जेडीयू विधायकों की बैठक बुलाई है। ऐसे में इस बैठक के नतीजों का इंतजार राजनीतिक गलियारे में बेसब्री से हो रहा है। 

नीतीश कुमार के पास विकल्प हैं कम
इधर बीबीसी हिंदी में वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद लिखते हैं कि राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव का आरोप है कि उनकी अगली पीढ़ी को निशाना बनाने के लिए सीबीआई ने उनके घर और रिश्तेदारों के रिहायशी ठिकानों पर छापेमारी की। हालांकि भाजपा ऐसे तमाम दावों को गलत बता रही है. उनका कहना है कि सीबीआई के छापों का राजनीतिक प्रतिशोध से कोई लेना-देना नहीं है. लेकिन जिस वक़्त में ये छापेमारी हुई है और जिनके ठिकानों को निशाना बनाया गया, यह कई सवाल खड़े करता है। 

ख़ैर, पहले भी सीबीआई का इस्तेमाल राजनीतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए किया गया है. लेकिन इनमें अंतर ये है कि अतीत में अदालतों ने देश की प्रमुख जांच एजेंसी को 'पिंजड़े में बंद तोता' कहने की हिम्मत दिखाई थी.

निशाना लालू तो नहीं...
जानकारों की मानें, तो कथित तौर पर राजनीतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए सीबीआई का इस्तेमाल सिर्फ़ लालू प्रसाद यादव को फ़िक्स करने के लिए तो नहीं ही किया गया होगा. वे जानते हैं कि लालू एक दोषी राजनेता हैं, जो कभी कोई चुनाव नहीं लड़ सकते हैं. वो पावर में वापिस नहीं आ सकते हैं. इसके अलावा, चारा घोटाले में उनके ख़िलाफ़ मामले पहले ही लंबित हैं. कई राजनैतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, हालिया छापेमारी आरजेडी की रैंक को गिराने की एक कोशिश ज़रूर कही जा सकती है. वो भी तब, जब 27 अगस्त को लालू यादव ने "भाजपा भगाओ, देश बचाओ" रैली करने का ऐलान कर रखा है.

6 जुलाई को यानी सीबीआई रेड से ठीक एक दिन पहले ही लालू प्रसाद यादव ने अपनी पार्टी की 21वीं वर्षगांठ पर पार्टी सदस्यों को संबोधित करते हुए कहा था कि भले ही उन्हें सलाखों के पीछे भेज दिया जाए, लेकिन उनकी पार्टी के सदस्य शपथ लें कि वो "भाजपा भगाओ, देश बचाओ" रैली को अंजाम देंगे.

राष्ट्रीय जनता दल की योजना इस रैली को 18 मार्च, 1996 में की गई ग़रीब महारैली से भी बड़ा बनाने की है. यह बात ध्यान में रखी जाए कि 1996 की रैली भी ठीक चारा घोटाले सार्वजनिक होने के बाद आयोजित की गई थी.

भाजपा का उद्देश्य क्या?
वहीं भाजपा एक तीर से कई शिकार करने का इरादा बना रही है. उन्हें पता है कि लालू की छवि कथित तौर पर ख़राब है और उन्हें निशाने पर लेकर भी कोई बड़ा राजनीतिक उद्देश्य हासिल नहीं हो पाएगा. वैसे ग़ौर करें तो यह पूरा प्लान काफ़ी पहले तैयार किया गया था. वो प्लान जिसका निशाना लालू के बेटे और उनकी बेटियां हैं. यही वजह है कि काफी सावधानीपूर्वक बनाई गई इस योजना के तहत बिहार के डिप्टी सीएम तेजस्वी प्रसाद यादव का नाम और राज्यसभा सांसद मीसा भारती का नाम एफ़आईआर में प्रमुखता से सामने आया.

भ्रष्टाचार के मामले में तेजस्वी का नाम आते ही भाजपा ने उनके इस्तीफ़े की मांग करना शुरू कर दिया. भाजपा उन चार मंत्रियों का हवाला भी दे रही है, जिनका नाम भ्रष्टाचार के मामलों में आते ही नीतीश कुमार ने उनसे इस्तीफा मांग लिया था.

जीतन राम मांझी की तरह...?
इनमें सबसे बड़ा नाम था जीतन राम मांझी का, जिन्हें 24 नवंबर, 2005 को नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री बनने के चार घंटे के भीतर ही कैबिनेट से हटा दिया था. जबकि शपथ ग्रहण समारोह के तुरंत बाद मीडिया से बातचीत में नीतीश ने कहा था कि उस वक़्त मांक्षी के ख़िलाफ़ विजलेंस केस लंबित था.

आज स्थिति यह है कि नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जेडी(यू) का मुंह बंद है. इस वक़्त केवल कांग्रेस है जो स्पष्ट रूप से लालू के साथ खड़ी है. कांग्रेस के पास लालू को मदद देने के अपने कारण हैं और उनके बड़े नेता पी चिदंबरम के ठिकानों पर भी सीबीआई ने कुछ महीने पहले ऐसी ही छापेमारी की थी.

बहरहाल, बढ़ते दबाव के बीच नीतीश कुमार ने अगर तेजस्वी यादव से इस्तीफे की मांग की तो इसकी भारी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल सकती हैं और इसका एक नतीजा महागठबंधन की टूट के तौर पर भी देखा जा सकता है. भाजपा का प्राथमिक उद्देश्य यही है, क्योंकि भाजपा को पता है कि बिहार में जब तक राजद और जेडी(यू), दोनों साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे, तब तक बिहार में किसी भी भविष्य के चुनाव में उन्हें जीत नहीं मिल सकती.

27 अगस्त की 'भाजपा भगाओ' रैली
नीतीश कुमार कुछ मुद्दों पर महागठबंधन से अलग राय पेश कर चुके हैं. चाहें बात नोटबंदी की हो या फिर राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार को लेकर, नीतीश और गठबंधन में मतभेद को भाजपा ने हमेशा थोड़ा गहरा करने की कोशिश की है. इस बात पर कभी भी शक नहीं किया जाना चाहिए कि लालू एक दोषी राजनेता होने के बावजूद राजनीति को अपने पक्ष में मोड़ने का माद्दा रखते हैं. हालांकि लालू कई मामलों में मुलायम सिंह यादव से अलग हैं, जो आज भी बिना डरे भाजपा को चुनौती दिए जा रहे हैं और भाजपा के ख़िलाफ़ एक महा-मोर्चा बनाने की कोशिश कर रहे हैं. मसलन, सपा और बसपा को 27 अगस्त की रैली में एक मंच पर लाना उनका मुख्य उद्देश्य है.

नीतीश कुमार की सीमा
वहीं एक समस्या नीतीश के साथ भी है कि वो अब उच्च नैतिक आधार नहीं बना सकते हैं. क्योंकि जब वो लालू के ख़िलाफ़ आरोप तय होने के एक साल के भीतर ही उनसे हाथ मिला सकते हैं, तो उनके बेटे तेजस्वी के ख़िलाफ़ तो सिर्फ़ एक एफ़आईआर दर्ज की गई है. यह नहीं भूलें कि मार्च 2015 में बिहार के सीएम नीतीश कुमार 'जनता परिवार की पार्टियों' के विलय के लिए हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला से मिलने तिहाड़ जेल गए थे. चौटाला भी भ्रष्टाचार के मामले में ही दोषी ठहराए गए थे. दूसरी ओर, पूर्व मंत्री शिवानंद तिवारी आरोप लगा रहे हैं कि भाजपा किस मुंह से तेजस्वी का इस्तीफ़ा मांग रही है, जब पीएम मोदी के मंत्रिमंडल में ही उमा भारती जैसे आरोपी नेता शामिल हैं.

हालांकि, लालू और पी चिदंबरम जैसे नेता, जो सीबीआई के दुरोपयोग की तकलीफ़ बता रहे हैं, वो यह सोचकर ही मन बहला सकते हैं कि राष्ट्रपति चुनाव से कुछ वक़्त पहले ही मार्गदर्शक मंडल के नेता लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को भी नहीं बख़्शा गया.



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