अतिथि शिक्षक: या तो याचिका लगाओ या भोपाल बुलवाओ

Saturday, October 8, 2016

सादर वन्दे साथियों।
दोस्तों बहुत दिनों से व्हाट्स एप, फेसबुक पर कुछ अतिथि शिक्षक संघ के नेताओं की पोस्ट देख रहा हूँ। जिसमें कमेंट्स में कई अतिथि शिक्षकों ने अपने मन की पीड़ा और अपने जहन में उठने वाले प्रश्नों को पूछा भी है परंतु शायद उनके प्रश्नों के संतोषजनक जबाब उन्हें नहीं मिल पा रहा है। मेरे जेहन में भी ऐसा ही एक प्रश्न आ रहा है।

एक तरफ तो अतिथि शिक्षक संघ के आला नेताओं द्वारा भोपाल में कोई बड़ा आंदोलन करने की बात की जा रही है। तो दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाने के नाम से लाख रुपयों का सहयोग करने का आह्वान हर जिले में किया जा रहा है। विचारणीय प्रश्न यह है कि जब आपको न्यायिक प्रक्रिया से होकर ही अपनी मंजिल को प्राप्त करना है, तो फिर भोपाल में सरकार के खिलाफ कैसा आंदोलन?

गरीब अतिथि शिक्षक पर 3 तरह का आर्थिक बोझ 
हो सकता है, मेरी बात शायद इस तरह के ताने बाने को बुनने वाले आयोजकों को हजम न हो।पर सभी अतिथि शिक्षकों के हित में पूछे जाने वाली बात को अपने लोगों से पूछने में कैसा संकोच। मेरा कहने का मतलब ये नहीं कि अतिथि शिक्षक अब आंदोलन न करें। बल्कि पूछने का आशय यह है कि किसी एक प्रक्रिया एक रास्ते को अपनायें या तो न्यायिक प्रक्रिया या फिर आंदोलन। क्योंकि दूर जिले से हजारों की संख्या में आने वाले अतिथि शिक्षकों को कम से कम 500 रूपये का खर्च निश्चित रूप से तो आता ही होंगा। साथ ही स्कूल न जाने के कारण उस दिन का वेतन भी नहीं मिल पाता हैं। बात पैसों की नहीं है, यदि यही पैसा न्यायिक प्रक्रिया के लिए सहयोग स्वरूप माँगा जाएँ। तो किसी अतिथि शिक्षकों पर अतिरिक्त भार भी नहीं पड़ेंगा, काफी हद तक हमारे संघ की आर्थिक स्थिति भी मजबूत होंगी। कहने का आशय यह है कि या तो याचिका के नाम पर सहयोग लो या फिर भोपाल बुलवाओ।

8 साल से जमे हैं कई जिलाध्यक्ष 
एक बात ओर मन में है। देश में प्रधानमंत्री, प्रदेश में मुख्यमंत्री को 5 वर्ष बाद पुनः चुनने के लिए दोबारा चुनाव होते है। अधिकारियों के लिए स्थानांतरण नीति होती है। परंतु हमारे संघ में तो 8 साल से कई जिलाध्यक्ष अंगद के पांव की तरह अपने पदों पर काबिज होकर जमे हुए है। न ही प्रदेश कार्यकारणी इन जिला संघ इकाइयों को भंग करती है और न ही पुनः चुनाव करवाती है। संघ को रजिस्टर कराते समय क्या नियम शर्ते थी, ये तो प्रदेश कार्यकरणी ही जानें। कई जिले में तो जिला संघ के कोषाध्यक्ष द्वारा न तो कभी वर्ष में एक बार भी आय-व्यय का लेखाजोखा बताया जाता है। न ही उसे सार्वजनिक किया गया और संघ के पदाधिकारियों के क्या कर्तव्य है, कई सदस्यों को तो इसकी भी जानकारी नहीं है।

अतिथि शिक्षक के दर्द कौन दूर करेगा 
खैर पारदर्शिता और विश्वास जीतने के लिए ये सब जरूरी भी है और परिवर्तन भी जरूरी है, क्योंकि हमारे बीच में ऐसे महानुभव है, जो संगठन को मजबूत करके अच्छे से क्रियान्वित कर सकते है। सबको मौका मिलना चाहिए। कई जगह तो केवल मीटिंग के नाम पर ही अतिथि शिक्षकों को याद किया जाता है। आम अतिथि शिक्षक की परेशानी से अतिथि शिक्षक संघ के पदाधिकारियों को कोई मतलब नहीं। कई अतिथि शिक्षकों को नए सत्र में बाहर कर दिया गया। तो कई जगह 3 माह तक वेतन तक अतिथि शिक्षकों नहीं मिला। इन सब बातों की सुध लेने हमारे जिले का तो अब तक कोई संघ का पदाधिकारी नहीं आगे आता। केवल खास अतिथियों पर ही ध्यान दिया जाता है आम अतिथि शिक्षक से उन्हें कोई सरोकार नहीं। 

विरोध नहीं, विचार है 
खैर जो भी है अच्छा है। परंतु अपने वर्चस्व को बनाये रखने के लिए किसी दूसरे का भ्रामक विरोध करना कहाँ तक उचित है? यह चिंतनीय प्रश्न है। यही हमारी कमजोरी है। मन में बहुत पीड़ा है।यदि कोई बात बुरी लगी हो तो माफी चाहता हूँ। किसी का दिल दुखना मेरा उद्देश्य बिलकुल नहीं है।
एक आम अतिथि शिक्षक

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