इस बंदर को एड्स नहीं है, कोई तो मदद करो

Saturday, October 8, 2016

उपदेश अवस्थी/भोपाल। वो आॅफिस आॅफिस सीरियल तो देखा ही होगा आपने। कुछ ऐसा ही हाल एक संवेदनशील युवक का हो गया जो एक घायल बंदर की जान बचाना चाहता है। उसे सरकार चवन्नी भी नहीं देगी लेकिन वो चिंता कर रहा है और वनविहार के अधिकारी जिन्हें मोटा वेतन और सरकारी सुविधाएं मिलतीं हैं, कुछ इस तरह व्यवहार कर रहे हैं मानो बंदर को एड्स हो गया हो। गजब तो यह है कि कलेक्टर भी कुछ नहीं कर रहे। बस मामले को टालते जा रहे हैं। मामला 2 दिनों से मीडिया की सुर्खियों में है, परंतु जानवरों के नाम पर संस्थाएं चलाने वाले भी बस सोशल मीडिया पर ही आॅनलाइन हैं। आम सक्रिय नागरिकों से उम्मीद ही क्या करें, वो तो 'सर्जिकल स्ट्राइक' के टंटे में उलझे हुए हैं। 

क्या हुआ घटनाक्रम 
छोला स्थित नगर निगम कॉलोनी निवासी 18 साल वर्षीय शुभम दोस्तों के साथ सलकनपुर से लौट रहे थे। मंडीदीप के पास रास्ते में उन्हें एक घायल लंगूर दिखा। उन्होंने दोस्त को बाइक रोकने को कहा। दौड़कर लंगूर के पास पहुंचे। शरीर से खून बहता देख अपनी बनियान उतारकर पट्टी बांधी। यहां से लंगूर को लेकर शुभम जहांगीराबाद स्थित पशु चिकित्सालय गए।

वनविहार वालों ने दरवाजे से ही लौटा दिया 
पशु चिकित्सालय में मामूली इलाज के बाद उन्हें वन विहार में वन्यप्राणी चिकित्सक को दिखाने और वहीं छोड़ने की सलाह दी गई। जब शुभम वन विहार पहुंचे तो उन्हें गेट से ही लौटा दिया और कहा-कलेक्टर से लिखवा कर लाओ।

कलेक्टर ने भी टरका दिया 
वन विहार से लौटाए जाने के बाद शुभम लंगूर को लेकर कलेक्टोरेट पहुंचे। कलेक्टर निशांत वरवड़े को पूरी घटना बताई। कहा कि मदद नहीं मिल रही है। लंगूर की जान मुश्किल में है। कलेक्टर ने कहा कि वन विहार लेकर जाओ मैं फोन करता हूं। शुभम लंगूर को लेकर फिर वन विहार पहुंचे, लेकिन उसे रखना तो दूर उसे यह कहकर लौटा दिया गया कि कलेक्टर से लिखित में आदेश लाओ। 

परिवार कर रहा है सेवा
घायल लंगूर की हालत को देख शुभम के पिता नर्मदा प्रसाद ने उसे खाना खिलाया। ठंड से बचाव के लिए कमरे में हीटर लगाया। ये वो परिवार है जिसे सरकार कोई अवार्ड नहीं देगी। जानवरों की जान बचाने के लिए मुआ एक विभाग खोल रखा है लेकिन किसी को कोई चिंता नहीं है। सब के सब घायल बंदर को तड़प तड़पकर मर जाने के लिए छोड़ दे रहे हैं। 

अतुल श्रीवास्तव, डायरेक्टर वन विहार का कहना है कि घायल लंगूर का इलाज कर दिया गया है। अन्य वन्य प्राणियों को इंफेक्शन न हो इसलिए उसे वन विहार में नहीं रख सकते। वो यह नहीं बता रहे कि यदि वो नहीं रख सकते तो कहां रखा जा सकता है, क्या किया जा सकता है। 

निशांत वरवड़े, कलेक्टर भी बस इतना कह रहे हैं कि एक युवक घायल लंगूर को लेकर आया था। उसकी स्थिति को देखते हुए वन विहार प्रबंधन को फोन किया था। उसे क्यों नहीं रखा इस बारे में प्रबंधन के अफसरों से पूछेंगे। 
मेरा सवाल
मैं सिर्फ यह जानना चाहता हूं कि यदि घायल बंदर की जगह टाइगर होता, मोर होता या हाथी होता तो क्या मुआ वनविभाग बस ऐसे ही खबरें पढ़ता रहता जैसे कि वो 2 दिन से पढ़े जा रहा है। वाइल्ड लाइफ को बचाने के लिए तमाम एनजीओ काम करते हैं। क्या इन दिनों वो 'गरबा' में बिजी हैं जो इस बंदर की सुध लेने नहीं आ रहे। कलेक्टर, जिले का मालिक होता है। हर समस्या का समाधान उसके पास होता है। तो क्या इस बंदर की जान बचाने का कोई तरीका उनके पास नहीं है। वो वनविहार से पूछेंगे, वनविहार जवाब देगा। इससे क्या होगा। बंदर तो घायल है। परिवार तो परेशान है। एक परिवार अपने काम धंधे छोड़कर निरीह प्राणी की जान बचाने की कोशिश कर रहा है और बेरहम सरकार मदद भी नहीं कर रही। 

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