क्या आपको पता है 'स्निगधभिन्नान्जनाभा' का अर्थ क्या होता है

Friday, September 23, 2016

भोपाल। क्या आप बता सकते हैं 'स्निगधभिन्नान्जनाभा' और 'विद्रुमभंगलोहित', का अर्थ क्या होता है। ये दोनों शब्द हिंदी की डिक्शनरी में भी नहीं हैं लेकिन इन टिपिकल हिंदी शब्दों का उपयोग माध्यमिक शिक्षा मंडल की 9-12वीं तक की किताबों में किया गया है। इसके अलावा कुछ भी ऐसे शब्द हैं जिन्हे आप पढ़ेंगे तो माथा पीट लेंगे।

हिंदी के प्रख्यात निबंधकार, कथाकार और समीक्षक डॉ. शिवप्रसाद सिंह के निबंध ‘रंगोली’ में इन दोनों शब्दों का उपयोग रंगों की व्याख्या के लिए किया गया है। माध्यमिक शिक्षा मंडल की कक्षा 12 वीं की विशिष्ट हिंदी की किताब में यह निबंध शामिल किया गया है। इस तरह के शब्दों को देखने के बाद आप यह भी कह सकते हैं कि माशिमं ने छात्रों को हिंदी से दूर भाग जाने के लिए ऐसा षडयंत्रपूर्वक किया है। 

192 पेज की किताब में 452 शब्द कठिन
कक्षा 9 वीं की विशिष्ट हिंदी की किताब में 41 पाठों को 192 पेजों में समेटा गया है। इनमें से 452 शब्द ऐसे हैं, जिनका मतलब अलग से समझाया गया है। हैरानी वाली बात यह है कि कक्षा 9 वीं की किताब में जिन दो शब्द स्निगधभिन्नान्जनाभा और विद्रुमभंगलोहित का उपयोग किया गया है, वो डॉ. भोलानाथ तिवारी के हिंदी-अंग्रेजी शब्दकोष में भी नहीं मिलते हैं।

कक्षा 9 वीं की ही किताब में डॉ. रघुवीर प्रसाद गोस्वामी द्वारा लिखा पाठ ‘कर्म कौशल’ महज दो पेज का है और इसमें कठिन शब्दाें की संख्या 31 है। इन शब्दों का अर्थ पता करने के लिए छात्रों को बार-बार पेज पलटना पड़ता है। इसी तरह वियोग हरि द्वारा लिखे दो पेज के निबंध ‘विश्व मंदिर’ में 27 कठिन शब्द हैं, जिनका शब्दार्थ अलग से बताया गया है।
  
यही स्थिति कक्षा 10 वीं, 11 वीं और 12 वीं की भी हिंदी विशिष्ट की किताबों में है कक्षा 10 वीं की विशिष्ट हिंदी की किताब में कुल 204 पेज हैं और कठिन शब्दों की संख्या 571 है। वहीं कक्षा 11 वीं की 218 पेज की हिंदी की किताब में 465 और 216 पेज की कक्षा 12 वीं की हिंदी की किताब में 281 शब्द ऐसे हैं जिनके लिए छात्रों और शिक्षकों को पाठों के आखिरी पेज पर दिए शब्दार्थों को बार-बार देखना पड़ता है। 

कुछ कठिन शब्द और उनके अर्थ-
शब्द - अर्थ 
स्निगधभिन्नान्जनाभा- स्निग्ध लेपयुक्त चमक 
यत्किंचित - थोड़ा बहुत
सुमुत्सुक- उत्साहित
वात्याचक्र- भंवर
हस्तामलकवत्- हथेली पर रखे आंवले के समान
भक्ष्याभक्ष- खादय, अखादय
प्रगल्भ - चतुर, हाेशियार
क्षीणवपु - कमजोर
आरूझाई- उलझाना
पाषाण कोर्त्तक- पत्थर की मूर्ति बनाने वाला
निर्निमेष - अपलक देखना
चरायंध - दुर्गंध
सांसोच्छेदन - सांसों को समाप्त करना
श्लाघ्य- प्रशंसनीय
स्वैराचार - स्वेच्छाचार 

किताबों को अनुमोदित करने वालों में कुलपति से लेकर शिक्षाविद तक शामिल
कक्षा 9 वीं से लेकर 12 वीं तक की हिंदी विशिष्ट की किताबों को डॉ. गोविदं शर्मा, पूर्व अतिरिक्त संचालक उच्च शिक्षा विभाग मप्र शासन की अध्यक्षता में गठित 15 से 16 सदस्यीय मध्यप्रदेश पाठ्यपुस्तक स्थायी समिति ने अनुमोदित किया हुआ है। इस समिति के सदस्यों में प्रदेश के विश्वविद्यालयों के पूर्व कुलपति, प्राेफेसर, शिक्षाविद, आयुक्त राज्य शिक्षा केंद्र, सचिव लोक शिक्षण संचालनालय, सचिव माध्यमिक शिक्षा मंडल व एनसीईआरटी के प्रतिनिधि तक शामिल थे। 

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