नईदिल्ली। अमेरिकी संसद में प्रधानमंत्री मोदी को मिले standing ovation और तालियों की जिस तरह से मार्केटिंग की गई, उसने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मोदी के सपोटर्स को 'कम जानकारी' वाला प्रमाणित कर दिया, क्योंकि यह तालियां सिर्फ मोदी को नहीं मिलीं। सबको मिलतीं हैं। यह उनका शिष्टाचार है। सभी अतिथियों के साथ समान रहता है। इसमें उपलब्धि जैसा कुछ भी नहीं है। अलबत्ता उनके लिए उपलब्धि हो सकती है जिन्होंने इससे पहले अमेरिकी संसद के व्यवहार को कभी देखा ही नहीं।
13 अक्टूबर 1949 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने अमेरिकी संसद को संबोधित किया था जब भी नज़ारा कुछ ऐसा ही था लेकिन उस समय ब्लैक एंड वाइट का ज़माना था। वीडियो देखें
मनमोहन सिंह से समय इतनी तालियाँ पड़ी थी की रुकने का नाम भी नही ले रही थी।
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और ऐसा ही नज़ारा तब भी था जब पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अमेरिकी संसद को सम्बोघित किया था। तालियों में कोई कमी नहीं थी। वीडियो देखें।
किसी भी चीज की मार्केटिंग करने से पहले यह जरूर विचार कर लेना चाहिए कि इसका इंपैक्ट क्या आएगा। जरा सोचिए, जब अमेरिकियों को यह पता चला होगा कि हमारा शिष्टाचार ही मोदी की सफलता बताया जा रहा है तो उन्होंने क्या इमेज बनाई होगी भारतीयों के संदर्भ में।
