भोपाल। यदि कोई किनारे से खड़ा होकर देखे तो लगता है कि मप्र के कर्मचारी बात बात पर आंदोलन किया करते हैं परंतु वो चौंक जाएंगे जब उन्हे यह पता चलेगा कि इन आंदोलनों को सरकार ने खुद इनवाइट किया है। कर्मचारियों की समस्याओं को सुलझाने के लिए बनाई गई राज्य स्तरीय संयुक्त परामर्शदात्री समिति की बैठक 2006 के बाद से आज तक नहीं हुई है। अब जब सरकार समस्याए सुनेगी ही नहीं तो लोग सड़कों पर ही आएंगे ना।
25 फरवरी 2006 को राज्य स्तरीय संयुक्त परामर्शदात्री समिति की लास्ट मीटिंग हुई थी। इसके बाद समस्याओं की सुनवाई ही बंद हो गई। बढ़ते बढ़ते कर्मचारियों की समस्याओं की संख्या 71 हो गई है। सारी समस्याओं को एक ज्ञापन में शामिल करना हो तो वो ज्ञापन ही उपन्यास बन जाता है।
1984 में सरकार ने संवाद के जरिए अधिकारियों व कर्मचारियों की मांगों का निपटारा करने की पहल की थी। सामान्य प्रशासन विभाग ने पिछले साल सितंबर में सभी विभागों, विभागाध्यक्षों और कलेक्टरों को साल में चार बार इन समितियों की बैठक बुलाने के आदेश दिए थे। आदेश में यह भी कहा गया था कि बैठकों की कार्यवाही का ब्योरा भी भेजा जाए।
इन मुख्य सचिवों के कार्यकाल में नहीं हुई बैठक
पीके मेहरोत्रा, एबी सिंह, बीके साहा, विजय सिंह, राकेश साहनी, अवनि वैश्य, आर परशुराम आदि के कार्यकाल में कोई बैठक नहीं हुई।
पिछले तीन साल में हुए कुछ प्रमुख आंदोलन
कर्मचारियों के संयुक्त मोर्चा ने 51 सूत्रीय मांगों को लेकर आंदोलन किया।
2013 में वेतन विसंगति दूर करने की मांग को लेकर प्रदेशभर के लिपिकों ने एक पखवाड़े तक आंदोलन किया।
डिप्लोमा इंजीनियर्स ने प्रदेशव्यापी आंदोलन कर रैलियां निकालीं।
संविलियन व वेतनमान की मांग को लेकर अध्यापकों ने दो आंदोलन किए।
पहले यह होता था
दस साल पहले तत्कालीन मुख्य सचिव केएस शर्मा तय समय पर संयुक्त परामर्शदात्री समिति की बैठक लेकर कर्मचारियों से समस्याओं व मांगों पर बातचीत करते थे। बैठक में मौजूद प्रमुख सचिवों या विभागाध्यक्षों को वे मौके पर ही समस्याओं का निपटारा करने के आदेश देते थे।
21 साल पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह मंत्रालय में हर महीने के पहले आैर तीसरे मंगलवार को कर्मचारी संगठनों के पदाधिकारियों से मिलते थे। जीएडी ने 22 जनवरी 1994 को दस संगठनों के पदाधिकारियों को बुलाकर यह आदेश बताए थे।
यह यूजफुल मैकेनिज्म है, बैठक बुलाना आसान
राज्य स्तरीय संयुक्त परामर्शदात्री समिति स्तर की बैठक बुलाकर कई संवर्गों के अधिकारियों व कर्मचारियों की मांगों व समस्याओं को निपटाया जा सकता है। यह यूजफुल मैकेनिज्म है, मैं समझता हूं, इससे आंदोलन की नौबत से बचा जा सकता है। तीन महीने में तीन घंटे का समय निकालकर बैठक ली जा सकती है।
केएस शर्मा
रिटायर्ड चीफ सेक्रेटरी
