मुंबई। एक परिवार न्यायालय ने तलाक की लंबित याचिका के दौरान एक उच्च शिक्षित महिला को भरण-पोषण का लाभ देने से इंकार कर दिया। अदालत ने कहा कि उसे खाली बैठने और पति पर बोझ बढ़ाने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। न्यायालय ने इस आधार पर उसकी याचिका को खारिज कर दिया।
कोर्ट के मुख्य जज डॉ. लक्ष्मी राव ने इस मामले में अपने फैसले में कहा कि हिंदू विवाह कानून की धारा 24 पति द्वारा मिलने वाली "खैरात" के इंतजार में बैठी महिलाओं की फौज बढ़ाने के लिए नहीं बनाई गई है। जज के मुताबिक ऐसी स्थिति में पत्नी अंतरिम भरण-पोषण की मांगने की हकदार नहीं है। वह स्थायी भरण-पोषण भी मांग नहीं कर सकती। इसका दावा तलाक के मुकदमे के खत्म होने पर ही किया जा सकता है। कोर्ट ने 30 मई को यह फैसला सुनाया।
पेश मामले में एक महिला ने पति से 25 हजार रुपये प्रतिमाह निर्वहन राशि और धारा 24 के तहत इतनी ही राशि अंतरिम भरण-पोषण के रूप में हासिल करने के लिए कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। महिला के इंजीनियर पति ने तलाक की याचिका दाखिल कर रखी है। पत्नी का कहना है कि उसकी आय का कोई स्रोत नहीं है। पति ने इसका विरोध करते हुए कहा कि वह अपनी मर्जी से आठ दिसंबर, 2012 को ससुराल से चली गई थी। इसलिए वह उसके भरण-पोषण के लिए जिम्मेदार नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि पत्नी भरण-पोषण की पात्र इसलिए भी नहीं है क्योंकि उसने पहले ही भादंसं की धारा 125 के तहत याचिका दाखिल कर रखी है और दूसरे यह कि पति से अलग होने के समय दिसंबर 2012 से मार्च 2015 तक वह भरण-पोषण की मांग के लिए किसी कोर्ट में नहीं गई। तीसरी बात यह है कि उसने ऐसे कागजात नहीं दिखाए, जिससे यह पता चले कि वह बेरोजगार है। अंतिम बात यह है कि वह उच्च शिक्षित महिला है और एमबीए की पढ़ाई कर रही है।
