गरीबी के आंकड़े या आंकड़ों की गरीबी

shailendra gupta
राकेश दुबे@प्रतिदिन। देश में गरीबी की रेखा की एक नई बहस शुरू होने जा रही है | अब तक केंद्र सरकार द्वारा जारी आंकड़ों की भाजपा आलोचना करती थी अब  गुजरात सरकार द्वारा जारी आकंड़ों के कारण  यह बहस उपजी है | गुजरात सरकार के अन्न और नागरिक आपूर्ति विभाग ने गरीबी की नई परिभाषा जारी की है।

इसके मुताबिक ग्रामीण इलाकों में जिस परिवार के हर सदस्यों की मासिक आमदनी 324 रुपये तक है, वे गरीब नहीं हैं, जबकि शहरों में 501 रुपये हर महीने कमाने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है।इसका मतलब है कि ग्रामीण इलाकों में 10 रुपये 80 पैसे प्रतिदिन कमाने वाला और शहरों में 17 रुपये प्रति दिन कमाने वाला गरीब नहीं हो सकता|

पूर्व में केंद्र सरकार द्वारा   जारी गरीबी की परिभाषा की भाजपा ने  जमकर आलोचना की थी। इससे पहले भी योजना आयोग की तरफ से यह कहा गया था कि ग्रामीण इलाकों में 26 रुपये प्रति दिन कमाने वाले गरीब नहीं हैं।इसके बाद कांग्रेस नेता राज बब्बर ने मुंबई में 12 रुपये में, जबकि रशीद मसूद ने दिल्ली में पांच रुपये में भरपेट भोजन मिलने का बयान दिया था, जिसकी बड़ी तीखी आलोचना हुई थी। खुद गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी भी अपनी रैलियों में गरीबी के इस मानक का मजाक उड़ाते देखे गए हैं।

प्रश्न यह है की क्या पूरे देश में कोई सर्वमान्य परिभाषा इस विषय पर तय नहीं की जा सकती | अभी तो जो हो रहा है वह गरीबी की परिभाषा के नाम पर गरीबों का मजाक उड़ाने ज्यादा कुछ और नहीं दिखाई देता है | वस्तुत: गाँव और शहर  दोनों ही जगह ऐसे लोगों की तादाद बड़ी है, जिन्हें दो जून की रोटी उपलब्ध नहीं है | सरकारी  योजनाये विज्ञपन पर होती हैं, और यदाकदा धरातल में उतरती हैं, भ्रष्टाचार उसे लील जाता है | आंकड़ों की दरिद्रता दूर करना जरूरी है | 

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