मोदी फेंकू, शिवराज पप्पू, रामदेव ठग, ये दिग्गी का दिमाग है या शैतान का घर

shailendra gupta
भोपाल। शालीनता और सभ्य राजनीति के लिए मध्यप्रदेश की पहचान पूरे देश में कायम रही है लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह मध्यप्रदेश की साख को ना जाने क्यों धूल चटाने पर तुले हुए हैं। निंदा और उपहास के और भी कई तरीके होते हैं, इस तरह की 'राखी सावतीं' राजनीति करने की जरूरत क्या है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि उनके हमले सटीक होते हैं, लॉजिकल और अक्सर उनकी पर्सनल इंवेस्टीगेशन के बाद आते हैं। दिग्विजय सिंह के पास ऐसी मोटी फाइल मौजूद है जिसमें मोदी की पीआर ऐजेंसी ने उन्हें 'हीरो' बनाते हुए झूठे आंकड़ों की झड़ी लगा दी है। 

मैं यह भी जानता हूं कि दिग्विजय सिंह इस फाइल के पन्नों को ठीक उस समय ही पलटेंगे जब मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया जाएगा। फिलहाल 'फेंकू' शब्द का उपयोग करके दिग्विजय सिंह केवल उन्हें इशारों इशारों में डराने का काम कर रहे हैं, और इसमें वो माहिर खिलाड़ी भी हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या 'फेंकू' जैसे 5 ग्राम के शब्द के अलावा कोई और शब्द उपयोग नहीं किया जा सकता था।

सब जानते हैं कि बाबा रामदेव दूध के धुले नहीं है। 100 प्रतिशत कारोबारी हो चुके हैं। उत्तराखंड में एक ऐसी कंपनी चल रही है जिसमें ब्रांड एम्बेडर पहले आया, बाद में ब्रांड तैयार हुआ। प्रोडक्ट को तो खुद नहीं पता कि उसका अपना नाम क्या है। ब्रांड एम्बेडर की दया पर ही बिके जा रहा है। रामदेव की पुस्तकों में यदि दम होती तो शिवराज सरकार से समझौता नहीं करना पड़ता परंतु किया गया। 

चुनाव में शिवराज को रामदेव की जरूरत है और रामदेव को मध्यप्रदेश सरकार की। क्या करें पापी पेट का सवाल है। टेक्स चोरी और दूसरे मामलों में भी जांच चल ही रही है। हम सभी जानते हैं कि जिन दवाओं को मध्यप्रदेश के गावों में नि:शुल्क प्रदान किया जाता है, रामदेव के कारखाने से पैक होने के बाद वो 500 रुपए की हो जातीं हैं। 

परंतु मेरा सवाल यह है कि एक प्रोफेशनल फ्रॉड को 'ठग्' कहकर विषय की गंभीरता को कम करने की कोशिश क्यों की जा रही है। क्या दिग्विजय सिंह को नहीं पता कि इस शब्द का उपयोग करने से रामदेव और तमाम मासूम जनता को उन पर हमला बोलने का मौका मिल जाता है।

इसी तरह शिवराज सिंह को 'पप्पू' कहने की क्या जरूरत। लोगों का आदर सत्कार करना, विनम्रता से बात करना और मुख्यमंत्री होने के बाद भी घमंड ना करना यह शिवराज सिंह चौहान का अपना व्यक्तिगत स्वभाव है। दिग्विजय सिंह को याद रखना चाहिए, विनम्रता केवल 'पप्पू' में नहीं होती, कभी कभी महावीर में भी होती है। मैं यहां यह नहीं कह रहा कि शिवराज 'महावीर' हैं, लेकिन कम से कम 'पप्पू' तो कतई नहीं है। ये शब्द अपने सरदारजी के लिए फिट हो सकता है।


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