नितिन के जाने और राजनाथ के आने के अर्थ

shailendra gupta
राकेश दुबे/प्रतिदिन/ राजनीति में कोई भी काम यूँ ही नहीं होता ,और भाजपा में तो बिलकुल नहीं होता | न तो यशवंत सिन्हा चुनौती देते और न यह सब होता| पूर्ति ग्रुप के छापे के बाद भाजपा के भीतर और सघ के भीतर जो बात चल रही थी उस पर रात दस बजे विराम लग गया | लेकिन इससे यह बात खत्म नहीं हो जाती कि भाजपा- काग्रेस में कौन साफ है और 2014 में में मतदाता किसे और क्यूँ चुने ?

पहले संघ भाजपा को साफ सलाह देता था | मानना न मानना भाजपा का अधिकार कहलाता था, पर भाजपा बात मानती आई है | नितिन गडकरी का पिछला नामांकन भी कुछ इसी प्रकार हुआ था | तब और अब में स्थिति बदल गई है संघ खुद एक राय नहीं हो पा रहा है | सरसंघचालक जी का मौन समर्थन नितिन गडकरी को था और अन्य अधिकारी किसी और के पक्ष में दिखाई देते थे |

अंत में राजनाथ सिंह के पक्ष में नितिन गडकरी ने अपना नाम वापिस लेना पड़ा| नितिन गडकरी को चुनौती देने वाले यशवंत सिन्हा ने भी राजनाथ सिंह के पक्ष में चुनाव न लड़ने का फैसला लिया | कौन पार्टी कैसे चलायेगा, यह तो वक्त बतायेगा | पार्टी तो कांग्रेस भी है और जनसंघ के बाद,भारतीय जनता पार्टी भी | अब दोनों पर भी आरोप हैं , भारतीय जनता पार्टी को इस चुनाव के बाद एक नई व्यूह रचना करना पड़ सकती है | शायद 2014 के चुनाव के पहले कुछ राज्यों में अपने सिपहसलार भी इधर उधर करना होंगे | शायद नई केन्द्रीय कार्यकारिणी में कुछ नये चेहरे होंगे जिनका किसी को अंदाज़ नहीं है | 

भारतीय जनता पार्टी के भीतर चलने वाली बातें अब राजनाथ सिंह को लेकर कुछ और आगे के संकेत देने लगी है , सवाल यह है कि नरेंद मोदी की बड़ते कद का क्या होगा ?सुषमा जी की सुषुप्तइच्छाओं का क्या होगा ? वक्त बतायेगा

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!