CBI जज ने आरुषि हत्याकांड को पजल गैम की तरह हल किया: हाईकोर्ट

Friday, October 13, 2017

इलाहाबाद। आरुषि तलवार हत्याकांड में हाईकोर्ट के 273 पेज के जजमेंट की कॉपी शुक्रवार को कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड की गई। हाईकोर्ट ने इस मामले में तलवार दंपत्ति को दोषमुक्त कर दिया है जबकि ट्रायल कोर्ट (स्पेशल सीबीआई कोर्ट) के जज जस्टिस श्यामलाल यादव ने उन्हे दोषी करार दिया था। वकीलों के अलावा देश भर के कई अन्य जिज्ञासु भी यह जानना चाहते हैं कि आखिर किस आधार पर सजा सुनाई गई थी और वो कौन से तर्क हैं जिनके आधार पर फैसला पलट दिया गया। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा, "ट्रायल कोर्ट के जज ने इस केस को गणित की पहेली जैसा समझकर हल करने की कोशिश की, उन्होंने किसी फिल्म डायरेक्टर की तरह काम किया और ख्याली माहौल (fictional scenario) रचा। 

न्यूज एजेंसी के मुताबिक इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस बीके नारायण और जस्टिस एके मिश्रा ने गुरुवार को तलवार दंपती को बरी करने वाले अपने ऑर्डर में कहा, "ट्रायल कोर्ट के जज ने आरुषि मामले में गलत चीजों पर गौर किया और कानून के बुनियादी सिद्धांतों को नजरअंदाज कर दिया। हाईकोर्ट ने जज की गलतियां और गलतफहमियां गिनाईं और कहा कि ट्रायल कोर्ट के जज को फेयर और ट्रांसपेरेंट होना चाहिए, एक आम बुद्धिमान शख्स के तौर पर काम करना चाहिए, उन्हें अपनी कल्पना से काम नहीं लेना चाहिए, इससे कानून का मजाक बनता है। इस मामले में हाईकोर्ट के 273 पेज के जजमेंट की कॉपी शुक्रवार को कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड की गई।

क्या है मामला?
मई 2008 में नोएडा के एक घर में आरुषि और उसके नौकर हेमराज की डेड बॉडी पाई गई थी। गाजियाबाद की स्पेशल सीबीआई कोर्ट इस मामले की सुनवाई की थी। एडिशनल सेशन जज श्यामलाल यादव ने मशहूर डेंटिस्ट राजेश और नूपुर तलवार को परिस्थितिजन्य सबूतों के आधार पर दोषी माना था। जस्टिस यादव ने 28 नवंबर 2013 को तलवार दंपती को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

जज पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो गए: HC
हाईकोर्ट ने अपने ऑर्डर में कहा, "लाल पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो गए और गलत चीजों को ध्यान में रखते हुए नतीजे तक पहुंचे। उन्होंने विकृत दलीलों द्वारा कही गई एक अलग कहानी और तथ्यों पर अनुमान लगाया। तलवार दंपती के खिलाफ परिस्थितिजन्य सबूत उन्हें दोषी ठहराने के लिए नाकाफी थे और इसलिए उन्हें शक का फायदा (बेनेफिट ऑफ डाउट) मिलना चाहिए था।

ट्रायल कोर्ट के जज ने ये नहीं बताया कि असल में हुआ क्या था?
जजमेंट के 10 पेजों में जस्टिस मिश्रा ने खुद अपने विचार रखे हैं। उन्होंने कहा, "ट्रायल कोर्ट के जज ने एक फिल्म डायरेक्टर की तरह बिखरे हुए बेमेल तथ्यों से रास्ता निकालने की कोशिश की, लेकिन यह नहीं बताया कि असल में हुआ क्या था। आश्चर्य की बात है कि लाल ने एक काल्पनिक कहानी पर यकीन कर लिया, जबकि 14-15 मई 2008 को तलवार दंपती के नोएडा स्थित घर के अंदर और बाहर हुआ कुछ और था। उन्हें एक मैथ्स टीचर की तरह काम नहीं करना चाहिए था, जो कुछ आंकड़ों की मदद से एक सवाल को हल करता है। उन्होंने परिस्थितिजन्य सबूतों से जुड़े मामलों को समझे बिना ही तलवार दंपती को दोषी ठहरा दिया।

फ्लैट में किसी बाहरी की मौजूदगी से इनकार नहीं किया जा सकता
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा है कि घटना की रात नोएडा वाले फ्लैट में किसी बाहरी शख्स की मौजूदगी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। ये भी हो सकता है कि घर में नौकर हेमराज, आरुषि और तलवार दंपती के अलावा कुछ और लोग भी रहे हों। हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और गवाहों के बयान के आधार पर कहा, "एक साफ और भरोसेमंद सबूत की अल्टरनेटिव हाइपोथिसिस (वैकल्पिक परिकल्पना) मौजूद थी, लेकिन उसे प्रॉसिक्यूशन की इस थियरी ने आंशिक तौर पर नष्ट कर दिया कि आरुषि के पैरेंट्स ने अपना अपराध कबूल कर लिया है।

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