परीक्षाएं बच्चों का विकास रोक देतीं हैं, ये तरीका रूढ़ीवादी है

Saturday, August 19, 2017

अनुराग बेहर। एक भारतीय छात्र हाई स्कूल छोड़ने से पहले सैकड़ों टेस्ट व परीक्षाओं से गुजर चुका होता है। हमारे समाज में यह दस्तूर दशकों से कायम है। आखिर इन परीक्षाओं का मकसद क्या होता है? एक जांच परीक्षा तब ली जाती है, जब कोई संस्था अपने यहां नियुक्ति से पहले अधिकाधिक अभ्यर्थियों में से कुछ को चुनना चाहती है। इस परीक्षा का मकसद यह देखना होता है कि जिनकी नियुक्ति की जा रही है, वह पद की अपेक्षाओं पर खरे उतर रहे हैं अथवा नहीं? हालांकि सच्चाई यह भी है कि ऐसी जांच परीक्षाएं अभ्यर्थियों की तमाम क्षमताओं का मूल्यांकन करने में असमर्थ होती हैं। सच कहा जाए, तो ये योग्यतम अभ्यर्थियों के चयन में भी सफल नहीं हो पातीं। इसी कारण ऐसी परीक्षाएं महज ‘शार्ट लिस्ट’ करने का जरिया ही बनकर रह जाती हैं और इनके द्वारा चुने गए अभ्यर्थियों का मूल्यांकन अंतत: समूह साक्षात्कार, इंटरव्यू या उसके अनुभव के आधार पर किया जाता है। 

एक परीक्षा किसी इंसान को प्रमाणित करने के लिए भी होती है। इसमें पास होने पर ही किसी को अकाउंटेंट, डॉक्टर या ऐसे ही अन्य प्रोफेशनल बनने के योग्य माना जाता है। मगर ऐसी परीक्षाएं आमतौर पर जटिल होती हैं। दूसरे शब्दों में कहें, तो ऐसी परीक्षाएं यह बताती हैं कि परीक्षार्थी किन मामलों में कमजोर है और कहां उसे ज्यादा मेहनत करने की जरूरत है? हालांकि एक अच्छी परीक्षा कई योग्यताएं बेहतर तरीके से जांचने का जरिया बन सकती है, जैसे परीक्षार्थियों में समस्या-समाधान करने या किसी मसले के समीक्षात्मक आकलन की क्षमता आदि।

समस्या यह है कि हमारी शिक्षा-व्यवस्था में कुछ ही जांच परीक्षाएं हैं, जो छात्रों के लिए मददगार साबित होती हैं या उनके पठन-पाठन को बेहतर बनाती हैं। परीक्षा का उपयोग आमतौर पर तुलना करने, छात्रों को रैंक देने और अवसर देने या न देने के लिए किया जाता है। हालांकि ऐसी परीक्षाओं को बताया जरूर उद्देश्यपरक जाता है, लेकिन हकीकत में ऐसा बहुत कम हो पाता है। हम में से जो लोग इन परीक्षाओं से गुजर चुके हैं, वे जानते होंगे कि इनका फायदा कितना सीमित है और कितना ये तनाव देती हैं। सच तो यही है कि हमारे महत्वपूर्ण फैसले जांच परीक्षा के भरोसे नहीं रहते, बावजूद इसके बच्चों के लिए ऐसी परीक्षाओं का सिलसिला अनवरत जारी है।

बच्चों को ऐसी ही यातनाएं कॉलेजों में दाखिले के वक्त भी झेलनी पड़ती हैं। ऐसी प्रवेश प्रक्रियाओं में ‘बोर्ड परीक्षा’ के नतीजे काफी मायने रखते हैं, जबकि हम सब वाकिफ हैं कि ऐसे ‘टेस्ट ट्रॉमा’ बच्चों पर कितना बुरा असर डालते हैं। दुर्योग से हमारा समाज आज भी इस प्रतियोगी मानसिकता से बाहर नहीं निकल पा रहा है। कॉलेज में दाखिले के समय ली जाने वाली परीक्षाएं और बोर्ड परीक्षा आदि ‘हाई स्टैक्स टेस्टिंग’ (जांचने की वह प्रक्रिया, जिससे यह पता लगाया जाए कि छात्र अगली कक्षा या डिप्लोमा आदि हासिल करने के योग्य है अथवा नहीं) का रूढ़िवादी तरीका मात्र है। 

शिक्षा का अधिकार कानून बच्चों पर इसी ‘अत्याचार’ को मिटाने की दिशा में पहला बड़ा कदम था। इसने आठवीं कक्षा तक न सिर्फ परीक्षाओं का जाल तोड़ा, बल्कि बच्चों को फेल करने की नीति भी खत्म की। इसके तहत जांच परीक्षा को कहीं अधिक बेहतर व्यवस्था मानी जाने वाली सतत व व्यापक मूल्यांकन (सीसीई) में बदल दिया गया। सीसीई से बच्चों के विकास का कई तरीकों से नियमित आकलन होने लगा और इससे मिले फीडबैक का इस्तेमाल पठन-पाठन का स्तर बेहतर बनाने में मददगार बना। इससे बच्चों की प्रगति की दिशा के साथ ही यह जानने में भी मदद मिली कि उसकी समझ कैसे और बेहतर बनाई जा सकती है। 

दुनिया भर के अध्ययन ऐसी व्यवस्था को बच्चों की समझ बेहतर बनाने वाला साबित कर चुके हैं। यह अध्यापन का तरीका बेहतर बनाने में शिक्षकों की भी मदद करता है। मगर अब मांग सीसीई को हटाने की हो रही है। तय है, अब शिक्षा के अधिकार कानून में संशोधन होगा और स्कूली शिक्षा-व्यवस्था में परीक्षाओं की वापसी होगी। ऐसा हुआ, तो हमारी शिक्षा-व्यवस्था वाकई कई कदम पीछे चली जाएगी। हम बच्चों को परखने की वही व्यवस्था अपनाने को आतुर हैं, जिसकी सीमा व नुकसान से हम अच्छी तरह परिचित हैं।
लेखक श्री अनुराग बेहर अजीम प्रेमजी फाउंडेशन के सीईओ हैं। ये लेखक के निजी विचार हैं। 

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