मोदी की नोटबंदी के खिलाफ रघुराम राजन के गुरूजी सड़क़ो पर

Friday, December 2, 2016

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भोपाल। जिस आदमी ने आदिवासियों के लिए अपनी लक्झरी लाइफ छोड दी। जिसने आईआईटी में आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन को पढ़ाया। ऐसे मौन तपस्वी प्रोफेसर आलोक सागर भी मोदी की नोटबंदी के खिलाफ सड़कें पर उतर आए हैं। वो आदिवासियों के साथ आंदोलन में खड़े दिखाई दिए।

आदिवासियों ने बैतूल में सड़कों पर नोटबंदी और 2000 के नए नोट का चलन रोकने को लेकर विरोध प्रदर्शन किया. इन मुद्दों को लेकर सड़कों पर विरोध करने उतरे आदिवासियों के साथ पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन के गुरु आलोक सागर भी आए लेकिन उन्होंने इस मामले में कुछ भी कहने से इनकार कर दिया.

पिछले 30 सालों से आदिवासियों के बीच रहकर एक गुमनाम जीवन गुजार रहे आलोक सागर ने केवल इतना बताया कि नोटबंदी के बाद से आदिवासियों का जीवन सबसे कठिन दौर में है. वो रोजाना ठगे जा रहे हैं और अपनी खून पसीने की कमाई से कुछ नहीं बचा पाते हैं.

प्रदर्शन में शामिल आदिवासियों के मुताबिक, पिछले कई दिनों से आदिवासी बाहुल्य इलाकों में व्यापारी ,ठेकेदार और बिचौलिए उन्हें ठग रहे हैं. आरोप है कि आदिवासियों को मजदूरी के बदले 1000 और 500 के पुराने नोट दिए जा रहे हैं, जिन्हें बदलवाने के लिये उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ रही है. आदिवासी बैंक से नोट नहीं बदलवा सके हैं उनसे कुछ व्यापारी और बिचौलिये 1000 का नोट 800 रुपये में और 500 का नोट 400 रुपये में लेकर उन्हें ठग रहे हैं.

आदिवासियों का कहना है कि 2000 रुपए का नया नोट भी उनके नुकसान की वजह बन रहा है. चिल्लर नहीं होने का बहाना बनाकर कई व्यापारी आदिवासियों को अनचाही चीजें खरीदने को मजबूर कर रहे हैं और उनकी छोटी-छोटी बचत पर भी डाका डाल रहे हैं.

मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में आईआईटी के पूर्व प्रोफेसर आलोक सागर जनजातियों के बीच अपनी डिग्रियां छुपाकर रह रहे हैं. उन्होंने 30 वर्ष बाद अपनी योग्यता का ब्योरा तब दिया, जब उन्हें पुलिस ने थाने बुलाया गया था.

मूलत: दिल्ली के रहने वाले आलोक सागर पिछले 30 सालों से बैतूल और होशंगाबाद जिले के जनजाति गांव में गुमनामी की जिंदगी जी रहे हैं. उन्होंने 90 के दशक से बैतूल जिले के जनजातीय गांव कोचामाऊ को अपना ठिकाना बनाया हुआ है. वह यहां जंगल को हरा-भरा करने के मिशन में लगे हुए हैं.
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