इस गांव में हर समाज का अलग श्मशान, सड़क पर हुआ आदिवासी का दाह संस्कार

Thursday, November 10, 2016

कमलेश सारड़ा/नीमच। कानाखेड़ा गांव में यूं तो तीन तीन श्मशान हैं परंतु हर श्मशान अलग समाज के लिए आरक्षित है। सरकार की ओर से यहां श्मशान के लिए आज तक कोई जमीन उपलब्ध नहीं कराई गई है अत: हरिजन आदिवासी और दूसरे समाजों के लोग सड़क किनारे दोह संस्कार करते हैं। आज भील समाज की एक महिला के दाह संस्कार से पहले मामला फिर सुर्खियों में आ गया। 

जिला मुख्यालय से महज 10 किलोमीटर दूर कानाखेड़ा गांव में रहने वाली रतनी बाई (उम्र 45 वर्ष) का मंगलवार रात को जिला अस्पताल में निधन हो गया। बुधवार सुबह रतनी बाई के परिजन अंतिम संस्कार करने के बजाए सीधे एसपी ऑफिस पहुंच गए। जहां उन्होंने एसपी से अंतिम संस्कार के लिए जमीन उपलब्ध कराने की गुहार लगाई। परिजनों ने अपनी शिकायत में बताया कि गांव में यूं तो तीन श्मशान घाट हैं। मीणा, मेघवाल और ब्राह्मण समाज के इन श्मशान घाटों में इन्हीं के समाज के लोगों को ही अंतिम संस्कार करने की अनुमति मिलती है।

पुलिस की मौजूदगी में सड़क किनारे अंतिम संस्कार
रतनी बाई के परिजनों की शिकायत मिलने के बाद पुलिस और प्रशासन का अमला तुरंत हरकत में आया. जिला मुख्यालय से पटवारी और पुलिस बल को अंतिम संस्कार के इंतजाम करने के निर्देश देकर गांव रवाना किया गया।

हालांकि, पुलिस के पहुंचने के बाद भी गांव के किसी भी श्मशान घाट के बजाए सड़क किनारे ही अंतिम संस्कार करने का फैसला लेना पड़ा.प्रशासनिक अफसरों ने ताबड़तोड़ मौके पर पहुंचकर रतनी बाई के परिजनों को सरकारी जमीन पर अंतिम संस्कार की अनुमति दी. इस कवायद में चार घंटे से ज्यादा का वक्त गुजर गया, जिसके बाद सड़क किनारे दाह संस्कार किया गया.

हर समाज का अपना श्मशान घाट
गांव के सरपंच प्रतिनिधि राधेश्याम नागदा ने गांव में प्रभावशाली तबके के अलग-अलग श्मशान घाट होने की बात स्वीकार की है। राधेश्याम ने बताया कि यहां संबंधित समाज के लोगों के अलावा अन्य लोगों को अंतिम संस्कार की अनुमति नहीं दी जाती है।

वहीं, पटवारी कन्हैयालाल जाट ने कहा कि श्मशान घाट के निर्माण के लिए सरकारी जमीन के आवंटन की प्रकिया शुरू हो गई है। पटवारी ने बताया कि, कानून और व्यवस्था ना बिगड़े इसलिए पुलिस फोर्स की मौजूदगी में अंतिम संस्कार किया गया।

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