रिश्वत के लिए फाइल पेंडिंग करने वाले अधिकारियों पर 3 लाख का जुर्माना, विभागीय कार्रवाई का आदेश

Updesh Awasthee
भोपाल, 7 नवंबर 2026:
हाई कोर्ट आफ मध्य प्रदेश की ग्वालियर बेंच ने रिश्वत के लिए एक फाइल को 329 दिन तक पेंडिंग करने के मामले में जिम्मेदार अधिकारियों पर 3 लाख का जुर्माना और विभागीय कार्रवाई के आदेश दिए हैं। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया की जुर्माना, मध्य प्रदेश शासन नहीं बल्कि जिम्मेदार अधिकारियों पर लगाया जा रहा है। प्रमुख सचिव को निर्देश दिया कि 30 दिन के भीतर सभी जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करके एक्शन टेकन रिपोर्ट (ATR) कोर्ट में सबमिट करें। 

मामला क्या है

मामला देवेंद्र सिंह परमार की नियुक्ति और सेवा समाप्ति से जुड़ा है। परमार को 1989 में रोजगार कार्यालय के माध्यम से नियमानुसार एलडीसी (लिपिक) पद पर नियुक्त किया गया था। राज्य स्तरीय स्क्रीनिंग कमेटी ने भी उनकी सेवा को वैध माना था। इसके बावजूद विभाग ने मार्च 2016 में नोटिस जारी किया और दिसंबर 2017/जनवरी 2018 में उनकी सेवाएं समाप्त कर दीं। देवेंद्र सिंह परमार ने सेवा समाप्ति के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी। सिंगल बेंच ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया था। राज्य शासन ने इस फैसले को चुनौती देते हुए 329 दिन बाद रिट अपील दायर की। देरी माफ करने के आवेदन में शासन कोई ठोस कारण नहीं बता सका, जिस पर डिवीजन बेंच ने कड़ी नाराजगी जताई।

प्रमुख सचिव एक महीने में विभागीय कार्रवाई करके रिपोर्ट प्रस्तुत करें

हाईकोर्ट ने एक सप्ताह में 3 लाख रुपए जमा करने और स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव को 30 दिनों के भीतर जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 2 दिसंबर को निर्धारित की गई है। प्रभारी अधिकारी (OIC) और ग्वालियर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. एमएस सागर पर 3 लाख रुपए की कॉस्ट लगाई है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जुर्माने की राशि सरकारी खजाने से नहीं भरी जाएगी, बल्कि संबंधित अधिकारी को अपनी जेब से जमा करनी होगी। यदि संबंधित अधिकारी इस राशि की भरपाई चाहते हैं, तो शासन देरी के लिए जिम्मेदार अन्य दोषी अधिकारियों से समान अनुपात में वसूली कर सकता है। कोर्ट ने इस मामले में प्रशासनिक जवाबदेही तय करने पर जोर दिया है।

कोर्ट को संदेह- अपील खारिज कराने की थी मंशा

डिवीजन बेंच ने देरी के लिए दिए गए स्पष्टीकरण पर असंतोष जताया। अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि OIC और संबंधित अधिकारियों का छिपा उद्देश्य अपील को जानबूझकर समय-सीमा से बाहर दायर कराना था, ताकि वह खारिज हो जाए और पहले दिए गए कानूनी निर्देशों से बचा जा सके।

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