रतीराम श्रीवास, टीकमगढ़, 3 अक्टूबर 2026: टीकमगढ़ मे क्या क्या धरोहरें छुपी हुई है, टीकमगढ़ कलेक्टर विवेक श्रोतीय ने अपने फेसबुक अकॉउंट पर एक पोस्ट साझा कर जानकारी दी है इसका अंदाज़ा सम्भवतः ख़ुद टीकमगढ़ को नहीं है।
टीकमगढ़ कलेक्टर विवेक श्रोतीय ने बताया कि, ज्ञान भारत अभियान के अंतर्गत पांडुलिपियों के लिए अनुरोध करने पर मुझे खरगापुर के श्री बेबी राजा जी नें श्रीमद् भगवद्गीता की एक अत्यंत छोटी और पुरानी प्रिंटेड प्रति की जानकारी दी थी जो पिछले मंगलवार को उन्होंने दिखाई। यह अद्भुत धरोहर उनकी पूज्य माताजी को किसी ने भेंट की थी। 350 पेज की इस गीता का आकार 4x4.4 cms का है। इस के दूसरे पृष्ठ पर भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन का महाभारत रेखा चित्र भी बना है।
परीक्षण से पता चलता है कि यह हाथ से लिखी पांडुलिपि नहीं, बल्कि मुद्रित पुस्तक है, और भारत में ऐसी छोटी छपी गीताएँ 19वीं सदी के उत्तरार्ध से छपने लगी थीं। कृष्ण-अर्जुन के रथ वाला चित्र काष्ठ-छाप (वुडकट) या आरंभिक शिलामुद्रण जैसा दिखता है, जिसका चलन 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी के आरंभ में था। पन्नों का पीला, भंगुर और किनारों से घिसा हुआ कागज़ आरंभिक मशीन-निर्मित कागज़ जैसा लगता है, जो उसी काल से मेल खाता है। पहले पृष्ठ पर "गीता माहात्म्य" (वराह पुराण से) का पाठ है, जो उस समय की जेबी और ताबीज़-नुमा गीताओं की शुरुआत में प्रायः मिलता है। इस लघु भगवद्गीता की छपाई, चित्र और कागज़ को देखकर इसका काल लगभग 1890 से 1950 ई. के बीच, यानी करीब 70 से 130 वर्ष पुराना आँका जा सकता है।
कंप्यूटर के आने के बाद मुद्रण आसान हुआ है, 1950 के पहले की मुद्रित भगवतगीता में से यह सम्भवतः सबसे छोटी प्रतियों में से एक है। इससे छोटी 1950 से पुरानी मुद्रित गीता दुनिया में कहाँ है? बतायें ?

