रेलवे विदाउट टिकट यात्री को मुआवजे से इनकार नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट

Updesh Awasthee
नई दिल्ली, 25 सितंबर 2026:
रेल दुर्घटनाओं के पीड़ितों के मामले में अक्सर ऐसा होता है। रेलवे मुआवजा देने से मना कर देता है क्योंकि, क्लेम के लिए जो डॉक्यूमेंट लगाए गए होते हैं उनमें रेलवे का टिकट नहीं होता। रेलवे कहता है कि यदि डॉक्यूमेंट में टिकट नहीं है मतलब, यात्री अवैध था और उसको मुआवजे का अधिकार नहीं है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि डॉक्यूमेंट में टिकट न होने का मतलब यह नहीं है कि, दुर्घटना के पीड़ित यात्री द्वारा टिकट नहीं लिया गया था अथवा वह एक अवैध यात्री है। यदि रेलवे किसी यात्री को अवैध कहता है तो उसको यह साबित करना होगा कि वह अवैध है। मजेदार मामला है, पढ़िएगा जरूर:- 

क्या था पूरा मामला?

यह दुखद घटना 27 सितंबर 2017 की है। महेशभाई नाम का युवक साबरमती और अहमदाबाद रेलवे स्टेशनों के बीच सामान्य कोच में यात्रा कर रहा था। अचानक ट्रेन में लगे तेज झटके और धक्का-मुक्की के कारण वह चलती ट्रेन से नीचे गिर गया और गंभीर रूप से घायल हो गया। उसे इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां एक महीने से अधिक समय तक जिंदगी की जंग लड़ने के बाद 31 अक्टूबर 2017 को उसकी मौत हो गई।

मृतक के पिता सुखाभाई नानजीभाई मकवाणा और माता ने रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल में मुआवजे के लिए याचिका दायर की। ट्रिब्यूनल ने 17 जून 2022 को अपने फैसले में माना कि महेशभाई एक 'सच्चा यात्री' (bona fide passenger) था और यह दुर्घटना रेलवे अधिनियम की धारा 123(c)(2) के तहत 'अप्रिय घटना' (untoward incident) थी। इसलिए मृत यात्री के परिजनों को 8 लाख रुपए मुआवजा देने का अवार्ड पारित किया, लेकिन जैसा कि हमेशा होता है। रेलवे ने ट्रिब्यूनल के आदेश को स्वीकार करने से मना कर दिया। फैसले को गुजरात हाई कोर्ट में चैलेंज किया गया है। 

रेलवे की ओर से दलील दी गई कि, मृतक के पास से कोई रेल टिकट बरामद नहीं हुआ है। और ना ही कोई ऐसा गवाह है जो यह कहता होगी उसके पास यात्रा के लिए कोई रेल टिकट था। इस प्रकार वह ट्रेन में एक अवैध यात्री था, इसलिए उसके परिवारजनों को मुआवजा प्राप्त करने का कोई हक नहीं है, और मुआवजा के लिए रेलवे की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती। गुजरात हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने रेलवे की दलील से सहमत होते हुए, 15 जुलाई 2025 को ट्रिब्यूनल का आदेश रद्द कर दिया। हाई कोर्ट के इस आदेश के कारण पीड़ित परिजनों को सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा।

सुप्रीम कोर्ट की मुख्य कानूनी टिप्पणियां:
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक निर्णय 'यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रीना देवी' का हवाला देते हुए कहा कि यदि दावेदार (माता-पिता) यह शपथ पत्र देते हैं कि टिकट खरीदा गया था लेकिन दुर्घटना या इलाज के दौरान खो गया, तो प्रारंभिक साक्ष्य का दायित्व पूरा हो जाता है। इसके बाद यह सिद्ध करने की जिम्मेदारी रेलवे पर आ जाती है कि यात्री बिना टिकट यात्रा कर रहा था। इस मामले में रेलवे गवाहों (आरपीएफ एएसआई और स्टेशन अधीक्षक) ने जिरह में स्वीकार किया कि उन्होंने घायल की जेब की जांच ही नहीं की थी। 

घटना 27 सितंबर 2017 को हुई थी, लेकिन रेलवे अधिकारियों ने इसकी जांच रिपोर्ट 17 मई 2018 (लगभग 7 महीने बाद) तैयार की। अदालत ने 'कलंदी चरण साहू बनाम दक्षिण-पूर्व मध्य रेलवे' का जिक्र करते हुए कहा कि रेलवे अपनी ही प्रशासनिक देरी का फायदा उठाकर पीड़ित परिजनों के दावे को खारिज नहीं कर सकता। 

अदालत ने कहा कि रेलवे अधिनियम, 1989 की धारा 124-A के तहत 'सख्त जवाबदेही' का सिद्धांत लागू होता है। जब एक घायल युवक अस्पताल में एक महीने से अधिक समय तक जीवन-मरण से जूझ रहा हो, तो ऐसे में परिजनों से टिकट संभालकर रखने की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं है। 

30 दिनों के भीतर मुआवजा देने का आदेश

न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदूरकर द्वारा लिखे गए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात उच्च न्यायालय के फैसले को पूरी तरह गलत करार देते हुए रद्द कर दिया और रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल के ₹8 लाख मुआवजे के आदेश को बहाल कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रेलवे को निर्देश दिया है कि वह अगले 30 दिनों के भीतर मुआवजे की पूरी राशि परिजनों को अदा करे।
(मामला: सुखाभाई नानजीभाई मकवाणा एवं अन्य बनाम भारत संघ, सिविल अपील संख्या 12951/2026, निर्णय तिथि: 25 सितंबर 2026)।  रिपोर्ट: उपदेश अवस्थी (विधि सलाहकार एवं पत्रकार)।

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!