इंदौर/झाबुआ, 12 अगस्त 2026: कोर्ट द्वारा benefit of doubt के कारण यदि किसी को रिहा कर दिया जाता है, तो यह पुलिस के इन्वेस्टिगेशन ऑफीसर की योग्यता पर सवाल होता है। झाबुआ के एक मामले में ऐसा ही हुआ। माननीय न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर और माननीय न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की युगलपीठ को एक ऐसी महिला को बरी करना पड़ा, जिसे निचली अदालत द्वारा हत्या की अपराधी घोषित करके सजा सुना दी गई थी। ऐसा इसलिए करना पड़ा क्योंकि पुलिस का केस कमजोर था। उसने शिकायत और गवाही के अनुसार एविडेंस कलेक्ट नहीं किए थे।
पूरा घटनाक्रम और पृष्ठभूमि
यह मामला 2 मार्च, 2014 की रात का है, जो झाबुआ जिले के ग्राम गोला छोटी में घटित हुआ था। अभियोजन के अनुसार, मृतका बुचा और उसकी पत्नी जेटाबाई (सूचनाकर्ता) अपने घर में सो रहे थे। रात करीब 01:00 बजे जेटाबाई की नींद दरवाजा खुलने की आवाज से खुली। उसने देखा कि उसका जेठ, लच्छू, हाथ में पत्थर लेकर घर में दाखिल हुआ और उसने बुचा के सिर पर वार किया। लच्छू के पीछे उसकी पत्नी शैल बाई (अपीलकर्ता) भी आई और उसने भी बुचा के हाथ पर पत्थर से हमला किया।
जेटाबाई के शोर मचाने पर आरोपी मौके से भाग गए, लेकिन बुचा की मौके पर ही मौत हो गई। शोर सुनकर ग्रामीण जामसिंह, भासू, जेमल, कालसिंह और नागरसिंह वहां पहुंचे, जिन्हें जेटाबाई ने पूरी घटना बताई। सुबह 06:30 बजे झाबुआ पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई गई।
कानूनी कार्यवाही और निचली अदालत का फैसला
पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 452 और 302 के तहत मामला दर्ज किया। जांच के बाद आरोप पत्र दाखिल किया गया। सत्र न्यायालय, झाबुआ (सत्र परीक्षण क्रमांक 48/2014) ने 3 जनवरी, 2015 को अपने निर्णय में शैल बाई और लच्छू को IPC की धारा 450 और 302/34 के तहत दोषी पाया। उन्हें आजीवन कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई गई थी। इस निर्णय के विरुद्ध शैल बाई और लच्छू ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 374 के तहत उच्च न्यायालय में अपील दायर की।
उल्लेखनीय है कि अपील के लंबित रहने के दौरान ही 6 मई, 2020 को अपीलकर्ता क्रमांक 2, लच्छू की इंदौर के एम.वाई. अस्पताल में मृत्यु हो गई, जिसके कारण उसके विरुद्ध अपील समाप्त (abated) कर दी गई।
दोनों पक्षों के तर्क
अपीलकर्ता का पक्ष: शैल बाई के वकील श्री आनंद सोनी ने तर्क दिया कि अपीलकर्ता निर्दोष है और उसे झूठा फंसाया गया है। उन्होंने मुख्य रूप से जेटाबाई (PW-1/PW-3) के बयानों में विरोधाभास की ओर ध्यान आकर्षित किया। वकील ने दलील दी कि जेटाबाई का दावा (कि शैल बाई ने मृतक के हाथ पर पत्थर मारा था) चिकित्सीय साक्ष्य से पूरी तरह उलट है, क्योंकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतक के हाथ पर कोई चोट नहीं पाई गई थी।
पुलिस का पक्ष: शासकीय अधिवक्ता श्री हरीश सिंह राठौर ने निचली अदालत के फैसले का समर्थन किया और अपील को खारिज करने की प्रार्थना की।
न्यायालय का विश्लेषण और निर्णय
उच्च न्यायालय ने मामले के रिकॉर्ड और गवाहों के बयानों का सूक्ष्मता से परीक्षण किया। न्यायालय के निर्णय के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
चिकित्सीय साक्ष्य बनाम चश्मदीद: डॉ. अनिल डामोर (PW-2), जिन्होंने पोस्टमार्टम किया था, ने अपनी रिपोर्ट में मृतक के सिर पर चोट, कान कटा होना, खोपड़ी का फ्रैक्चर और पसलियां टूटने का उल्लेख किया था। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि मृतक के हाथ पर कोई चोट नहीं थी। न्यायालय ने माना कि चश्मदीद जेटाबाई का शैल बाई के विरुद्ध दिया गया बयान चिकित्सा रिपोर्ट से मेल नहीं खाता।
संदेह का लाभ: न्यायालय ने राजस्थान उच्च न्यायालय के सत्य प्रकाश पाठक बनाम राज्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि यदि चश्मदीद गवाह का बयान चिकित्सीय साक्ष्य के विपरीत है, तो उस पर भरोसा करना सुरक्षित नहीं है।
जांच में कमी (न्यायाधीश की विशेष टिप्पणी): न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि पुलिस ने इस बात की कोई जांच नहीं की कि आरोपी रात के समय बंद दरवाजे के बावजूद घर में कैसे दाखिल हुए। न्यायालय निचली अदालत के इस निष्कर्ष से सहमत नहीं हुआ कि आरोपी घर में जबरन घुसे थे।
अंतिम आदेश
न्यायालय ने शैल बाई को IPC की धारा 450 और 302/34 के आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने आदेश दिया कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए। इसके साथ ही आपराधिक अपील को स्वीकार कर लिया गया।

