जबलपुर, 5 अगस्त 2026: मध्य प्रदेश में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण मामले में, हाई कोर्ट में डिबेट खत्म हो गई है। यह बहस 15 दिन तक चली। सभी पक्षों ने विस्तार पूर्वक अपनी बात कही। हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। सभी पक्षों के तर्कों का विश्लेषण करने के बाद फैसला सुनाया जाएगा।
जिनकी नियुक्ति हो गई वह सुरक्षित
मध्य प्रदेश सरकार के अधिवक्ता के.एम. नटराज को हाई कोर्ट ने स्पष्ट बताया कि फैसला कुछ भी हो, 27% आरक्षण के हिसाब से जो नियुक्तियां हो चुकी हैं, उनको प्रोटेक्ट किया जाएगा। ओबीसी आरक्षण के पक्ष में डिबेट कर रहे सीनियर एडवोकेट रामेश्वर सिंह ठाकुर ने आज हाईकोर्ट से पूछा कि, 27% ओबीसी आरक्षण के साथ 10% EWS आरक्षण को भी चैलेंज किया गया है। EWS आरक्षण के मामले में, इस मामले के साथ लिंक है, क्या फाइनल डिसीजन में ओबीसी के साथ ईडब्ल्यूएस का फैसला भी सुनाया जाएगा।
EWS आरक्षण पर अलग से बात करेंगे
इस पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि, 10% EWS आरक्षण के मामले को, 27% ओबीसी आरक्षण के मामले के बंच से अलग कर दिया है। 10% ईडब्ल्यूएस आरक्षण मामले में अलग से सुनवाई की जाएगी।
मध्य प्रदेश के 27% ओबीसी आरक्षण मामले में मुख्य कानूनी मुद्दे
50% की सीमा का उल्लंघन: सबसे प्रमुख मुद्दा यह है कि क्या राज्य सरकार आरक्षण की 50% की सीमा को पार कर सकती है, जिसे इंद्रा साहनी (Indra Sawhney) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तय किया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि 50% की सीमा एक संवैधानिक सीमा है और इसे केवल संविधान संशोधन के माध्यम से ही बदला जा सकता है, सामान्य कानून के माध्यम से नहीं।
पर्याप्त बनाम आनुपातिक प्रतिनिधित्व (Adequate vs. Proportionate Representation): एक मुख्य कानूनी तर्क यह है कि संविधान का अनुच्छेद 16(4) "पर्याप्त प्रतिनिधित्व" की बात करता है, न कि जनसंख्या के अनुपात में "आनुपातिक प्रतिनिधित्व" की। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पर्याप्त प्रतिनिधित्व को आनुपातिक प्रतिनिधित्व नहीं माना जा सकता।
समकालीन मात्रात्मक डेटा का अभाव (Lack of Contemporaneous Quantifiable Data): यह तर्क दिया गया है कि राज्य सरकार के पास आरक्षण बढ़ाने के लिए कोई नया या समकालीन डेटा नहीं था। सरकार ने कथित तौर पर 1931 की जनगणना या 1983 की पुरानी महाजन रिपोर्ट पर भरोसा किया, जो वर्तमान स्थिति को नहीं दर्शाती।
आयोग के साथ परामर्श न करना: एक महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक मुद्दा यह उठाया गया है कि राज्य सरकार ने आरक्षण बढ़ाने से पहले पिछड़ा वर्ग आयोग के साथ आवश्यक परामर्श नहीं किया। इसे मराठा आरक्षण मामले की तरह ही कानून के लिए घातक बताया गया है।
असाधारण परिस्थितियाँ (Extraordinary Circumstances): इंद्रा साहनी मामले के पैराग्राफ 810 के अनुसार, 50% की सीमा को केवल असाधारण और विषम परिस्थितियों (जैसे दूर-दराज के क्षेत्र) में ही पार किया जा सकता है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि मध्य प्रदेश में ऐसी कोई असाधारण स्थिति मौजूद नहीं है जो इस उल्लंघन को उचित ठहरा सके।
कल्याणकारी गेरीमेंडरिंग (Welfare Gerrymandering): याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि यह संशोधन राजनीतिक लाभ के लिए किया गया है, जिसे "वैलफेयर गेरीमेंडरिंग" कहा गया है। उन्होंने अध्यादेश के समय और बिना डेटा के इसे लागू करने पर सवाल उठाए हैं।
डी फैक्टो सिद्धांत (De Facto Doctrine): सुनवाई के दौरान यह भी चर्चा हुई कि यदि इस आरक्षण कानून को असंवैधानिक घोषित कर दिया जाता है, तो इसके तहत पहले ही की जा चुकी नियुक्तियों का क्या होगा। राज्य की ओर से तर्क दिया गया कि नियुक्तियों को सुरक्षित रखा जाना चाहिए, जबकि याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अवैध कानून के तहत की गई नियुक्तियां सुरक्षित नहीं रह सकतीं।
अदालत में इन मुद्दों पर बहस इस बात पर केंद्रित है कि क्या राज्य की विधायी शक्ति सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित 50% की आरक्षण सीमा से ऊपर है या नहीं।

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