इंदौर, 8 अगस्त 2026: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की पांच न्यायाधीशों की पूर्ण पीठ (Larger Bench) ने ठेकेदारों को काली सूची में डालने (ब्लैकलिस्टिंग) के संबंध में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी कानूनी सिद्धांत प्रतिपादित किया है। न्यायालय ने बहुमत से यह निर्णय दिया है कि ब्लैकलिस्टिंग के आदेश को सीधे उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है और इसके लिए मध्य प्रदेश मध्यस्थम अधिकरण (Arbitration Tribunal) जाना अनिवार्य नहीं है।
नितिन एंटरप्राइजेज बनाम इंदौर नगर निगम
इस कानूनी विवाद की शुरुआत नितिन एंटरप्राइजेज (प्रोप्राइटर नितिन लोधवाल) नामक फर्म से हुई, जो PWD के साथ एक पंजीकृत ठेकेदार है। इंदौर नगर निगम ने 15 फरवरी 2019 को वार्ड नंबर 21 के आम्रपुरी रोड पर सीमेंट कंक्रीट कार्य के लिए निविदा आमंत्रित की थी, जिसे नितिन एंटरप्राइजेज ने प्राप्त किया। हालांकि, 30 अक्टूबर 2020 को निगम ने काम समय पर पूरा न होने का हवाला देते हुए अनुबंध समाप्त कर दिया और फर्म को तीन साल के लिए काली सूची (Blacklist) में डाल दिया।
फर्म ने इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी। नगर निगम ने प्रारंभिक आपत्ति उठाई कि चूंकि यह मामला 'वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट' से जुड़ा है, इसलिए मध्य प्रदेश मध्यस्थम अधिकरण अधिनियम, 1983 की धारा 7 के तहत पीड़ित को केवल अधिकरण (Tribunal) में जाना चाहिए, न कि सीधे हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर करनी चाहिए।
न्यायालय के समक्ष मुख्य कानूनी प्रश्न
मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे पांच न्यायाधीशों की बड़ी पीठ को भेजा गया, जिसने मुख्य रूप से दो बिंदुओं पर विचार किया:
- क्या ब्लैकलिस्टिंग से होने वाले नुकसान का मौद्रिक मूल्यांकन (Quantification) किया जा सकता है?
- क्या अनुबंध समाप्ति और ब्लैकलिस्टिंग के संयुक्त आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय में रिट याचिका (अनुच्छेद 226) विचारणीय है?
याचिकाकर्ता और न्यायमित्र (Amicus Curiae) के तर्क:
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं और न्यायमित्रों (अमित अग्रवाल, वी.के. जैन, अशोक सेठी, पीयूष माथुर आदि) ने दलील दी कि:
- ब्लैकलिस्टिंग केवल एक संविदात्मक मामला नहीं है, बल्कि यह किसी व्यक्ति के व्यवसाय करने के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 19(1)(g)) पर हमला है और उसके लिए 'सिविल डेथ' (नागरिक मृत्यु) के समान है।
- 1983 के अधिनियम के तहत गठित अधिकरण केवल उन विवादों को सुन सकता है जहां 'निश्चित या निर्धारित की जा सकने वाली राशि' (Ascertained or Ascertainable money) का दावा हो। ब्लैकलिस्टिंग से होने वाली प्रतिष्ठा की हानि और भविष्य के अवसरों के नुकसान का सटीक मौद्रिक मूल्यांकन असंभव है।
- ब्लैकलिस्टिंग राज्य की प्रशासनिक शक्ति का प्रयोग है, जो सार्वजनिक कानून (Public Law) के दायरे में आता है, इसलिए इसकी न्यायिक समीक्षा केवल संवैधानिक न्यायालय (High Court) ही कर सकता है।
प्रतिवादी (नगर निगम और राज्य सरकार) के तर्क:
इंदौर नगर निगम और राज्य की ओर से महाधिवक्ता (Advocate General) और अन्य वकीलों ने तर्क दिया कि:
ब्लैकलिस्टिंग अनुबंध के निष्पादन या गैर-निष्पादन से उत्पन्न एक विवाद है, जो मध्य प्रदेश मध्यस्थम अधिकरण अधिनियम, 1983 की धारा 2(1)(d) के तहत 'विवाद' की परिभाषा में आता है।
- 2019 के संशोधन के बाद 'Ascertainable' शब्द जोड़ा गया है, जिसका अर्थ है कि भविष्य के संभावित नुकसान का भी आकलन अधिकरण कर सकता है।
- यदि अनुबंध समाप्ति और ब्लैकलिस्टिंग एक ही आदेश से हुए हैं, तो पूरे मामले को एक साथ अधिकरण में ही सुना जाना चाहिए ताकि 'फोरम शॉपिंग' से बचा जा सके।
न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय और बहुमत की राय
न्यायमूर्ति विनय सराफ द्वारा लिखित बहुमत के निर्णय (जिसमें कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी शामिल थे) में निम्नलिखित निष्कर्ष दिए गए:
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ब्लैकलिस्टिंग का आदेश देने की शक्ति राज्य की अंतर्निहित प्रशासनिक शक्ति है, जो अनुबंध की शर्तों से परे है।
- ब्लैकलिस्टिंग से होने वाला नुकसान केवल आर्थिक नहीं होता, बल्कि यह प्रतिष्ठा और साख (Goodwill) की हानि है। यह नुकसान 'निश्चित' (Ascertained) नहीं है और न ही इसे वैज्ञानिक रूप से मापा जा सकता है, इसलिए यह 1983 के अधिनियम की धारा 2(1)(d) के दायरे से बाहर है।
- चूंकि अधिकरण ब्लैकलिस्टिंग के आदेश को रद्द करने या उसकी घोषणा करने में सक्षम नहीं है, इसलिए पीड़ित पक्ष के पास अनुच्छेद 226 के तहत सीधे उच्च न्यायालय आने का अधिकार है।
गौरी गणेश (2018) और अवस्थी ब्रदर्स (2019) Not correct law
पुराने फैसलों को पलटा: न्यायालय ने 'गौरी गणेश' (2018) और 'अवस्थी ब्रदर्स' (2019) के मामलों में दिए गए उन निर्णयों को गलत (Not correct law) ठहराया, जिनमें कहा गया था कि ब्लैकलिस्टिंग के खिलाफ भी अधिकरण जाना चाहिए।
न्यायाधीशों की विशेष टिप्पणी
न्यायालय ने अपने फैसले में अत्यंत मार्मिक टिप्पणी करते हुए कहा कि:
"ब्लैकलिस्टिंग के गंभीर नागरिक परिणाम होते हैं, यह व्यवसाय के अवसरों और साख की हानि है। यह उस व्यक्ति या इकाई की नागरिक और व्यावसायिक मृत्यु (Civil and Commercial death) के समान है, जिसे भविष्य की निविदाओं में भाग लेने से रोक दिया जाता है।"
न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर ने अपनी सहमति देते हुए यह स्वीकार किया कि हालांकि वह 'गौरी गणेश' (पुराने फैसले) के हस्ताक्षरकर्ताओं में से एक थे, लेकिन अब पुनर्विचार करने पर वह पाते हैं कि वह फैसला सही कानून नहीं था।
वहीं, न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल ने असहमत (Dissenting) होते हुए अपनी अलग राय दी कि ब्लैकलिस्टिंग अनुबंध से जुड़ा मामला है और इसके लिए अधिकरण ही उचित मंच है।
इस निर्णय के बाद, मध्य प्रदेश में अब किसी भी ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट में डाले जाने पर उसे अधिकरण की लंबी प्रक्रिया में फंसने के बजाय सीधे उच्च न्यायालय से त्वरित राहत प्राप्त करने का संवैधानिक मार्ग मिल गया है।

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