जबलपुर, 19 जून 2026: व्यापारिक मामलों में "मध्यस्थता (arbitratorship)" की स्थिति को लेकर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट द्वारा लैंडमार्क जजमेंट दिया गया है। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का कहना है कि, ड्राफ्ट में केवल May शब्द का ले उल्लेख कर देने से मध्यस्थता की अनिवार्यता खत्म नहीं होती। हाईकोर्ट ने यह निष्कर्ष सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांतों को लागू करते हुए निकाला। यह समाचार समस्त बड़े कारोबारी और प्राइवेट कंपनी के डायरेक्टर्स के लिए महत्वपूर्ण है। इसके अलावा समस्त प्राइवेट कंपनियों के विधि विभाग से संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए भी महत्वपूर्ण है।
Valuation of shares dispute resolution through arbitration in Madhya Pradesh
M/S JVS Foods Pvt. Ltd. vs. M.P. State Agro Industries Development Corporation Ltd. (AC No. 90 of 2024) विवाद का मुख्य कारण विपक्षी दल (MPSAIDC) का शेयर होल्डिंग समझौते से बाहर निकलना (Exit) था। समझौते के अनुसार, बाहर निकलने वाले पक्ष के इक्विटी शेयरों को दूसरे पक्ष द्वारा खरीदा जाना था, लेकिन शेयरों के मूल्यांकन (Valuation of shares) को लेकर दोनों पक्षों में सहमति नहीं बन पाई। जेवीएस फूड्स ने इस विवाद को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाने के लिए समझौते के आर्बिट्रेशन क्लॉज का हवाला दिया और 22 मई 2024 को औपचारिक नोटिस जारी किया, लेकिन एम.पी. स्टेट एग्रो ने इसे यह कहते हुए टाल दिया कि उनके बीच अभी बातचीत (Negotiations) जारी है।
Mandatory vs optional arbitration clause interpretation and the use of 'may' in agreements
इस मामले में सबसे रोचक कानूनी बहस 'मध्यस्थता क्लॉज' की व्याख्या को लेकर हुई। एम.पी. स्टेट एग्रो के वकील ने तर्क दिया कि समझौते के क्लॉज में 'may' (सकता है) शब्द का उपयोग किया गया है, जिसका अर्थ है कि मध्यस्थता वैकल्पिक (Optional) है, अनिवार्य नहीं। उनका कहना था कि जब तक दोनों पक्ष मध्यस्थता के लिए अपनी ताज़ा सहमति (Fresh consent) न दें, उन्हें इसके लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि 'may' शब्द केवल एक संभावना को दर्शाता है।
High Court of Madhya Pradesh arbitration case latest judgment on parties' intention
हालांकि, न्यायमूर्ति दीपक खोत ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के 'Tarun Dhameja vs. Sunil Dhameja' मामले का संदर्भ देते हुए स्पष्ट किया कि भले ही क्लॉज में 'Optional' लिखा हो, इसका मतलब यह नहीं है कि आर्बिट्रेशन क्लॉज का अस्तित्व ही नहीं है। कोर्ट ने पाया कि समझौते के क्लॉज 16 में अन्य जगहों पर 'Shall' का उपयोग किया गया है और क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) के लिए भोपाल को तय किया गया है, जो यह दर्शाता है कि पक्षकारों की वास्तविक मंशा (Intention of the parties) विवाद को मध्यस्थता से सुलझाने की थी। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि एम.पी. स्टेट एग्रो ने पहले भी अन्य मामलों में इसी तरह के समझौतों के तहत मध्यस्थता का समर्थन किया है, इसलिए वे अब अपनी सुविधा के अनुसार अपना रुख नहीं बदल सकते।
Former Judge Alok Verma appointed as sole arbitrator in JVS Foods vs MP State Agro
अंततः, सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद, उच्च न्यायालय ने पूर्व न्यायाधीश श्री आलोक वर्मा (Shri Alok Verma) को इस विवाद के समाधान के लिए एकमात्र मध्यस्थ (Sole Arbitrator) नियुक्त किया है। मध्यस्थता की कार्यवाही भोपाल में आयोजित की जाएगी और यह 'M.P. Arbitration Center (Domestic and International) Rules, 2019' के अनुसार संचालित होगी। इस निर्णय से यह स्पष्ट हो गया है कि तकनीकी शब्दों के हेरफेर से अधिक पक्षकारों की मूल मंशा और पिछले आचरण को कानूनी महत्व दिया जाएगा।

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