DIGVIJAY SINGH: बुझते दीपक की फड़फड़ाती लौ

07 November 2018

नई दिल्ली। टिकट वितरण के दौरान ज्योतिरादित्य सिंधिया से भिड़ जाने के बाद विशेषज्ञों का फोकस एक बार फिर दिग्विजय सिंह की तरफ चला गया है। 5 साल में मप्र से सारे कांग्रेसी दिग्गजों को साफ करके पूरे प्रदेश के अकेले क्षत्रप बन जाने वाले दिग्विजय सिंह अब कांग्रेस में दयनीय स्थिति होने के बावजूद सक्रिय क्यों हैं। अपने स्वाभिमान की रक्षा करते हुए किनारे क्यों नहीं हो जाते। 

कांग्रेस हाईकमान के सामने दिग्विजय सिंह की वेल्यू
दिग्विजय सिंह से पार्टी ने सारे प्रभार छीन लिए थे। वो केवल नाम के महासचिव और राज्यसभा सदस्य रह गए थे। 
जब दिग्विजय सिंह नर्मदा यात्रा के लिए अवकाश मांगा और वो स्वीकृत हुआ। प्रमाणित हो गया था कि कांग्रेस ने दिग्विजय सिंह को मुक्त कर दिया है। 
पार्टी ने दिग्विजय सिंह की समन्वय यात्रा को रोक दी थी। बड़ी मुश्किल से अनुमति मिली। 
राहुल गांधी के रोड शो में दिग्विजय सिंह का फोटो तक नहीं लगाया। 
दिग्विजय सिंह को जनता के बीच जाने से प्रतिबंधित कर दिया गया। 
दिग्विजय सिंह को सार्वजनिक भाषण देने से मना कर दिया गया। 
दिग्विजय सिंह को ट्वीटर पर भी अनुशासित कर दिया गया। 
भरी मीटिंग में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने दिग्विजय सिंह को लताड़ लगा दी। 
राहुल गांधी ने दिग्विजय सिंह के सम्मान में 2 शब्द तक नहीं कहे। 

साफ नजर आ रहा है कि कांग्रेस अब दिग्विजय ​को पसंद नहीं करती। हाईकमान चाहता है कि दिग्विजय सिंह सन्यास ले लें। बस बाहर इसलिए नहीं निकाल रहा कि कहीं एक डर है, शायद नुक्सान कर दे। दिग्विजय सिंह समर्थक एक पत्रकार का कहना है कि दिग्विजय की मजबूरी इसलिए है क्योंकि उन्हें अपने बेटे जयवर्धन सिंह को राजनीति में सेट करना है, जो कि राघोगढ़ से विधायक हैं। उन्हें अपने हाशिये पर जाने का इतना मलाल नहीं है। वो बस इतनी कोशिश में हैं कि यदि मप्र में कांग्रेस की सरकार बनती है तो उनके बेटे को अच्छा मंत्रालय मिल जाए। दिग्विजय सिंह के समर्थक पूरे राज्य में फैले हुए हैं। उन्हें उन समर्थकों के लिए भी सियासत करनी है। उनकी भी सेटिंग करनी है।

वरिष्ठ पत्रकार गिरिजा शंकर मानते हैं, ‘दिग्विजय हों या कमलनाथ या फिर सिंधिया, ये लोग अगर प्रदेश के इतने ही बड़े नेता होते तो तीन बार कांग्रेस चुनाव क्यों हारती? मतलब कि तीनों प्रदेश में कोई बड़े नेता नहीं हैं। इसलिए मध्य प्रदेश कांग्रेस में ऐसा कोई नेता नहीं दिखता जो नाराज़ होने पर पार्टी को नुकसान पहुंचाने की स्थिति में हो।

वे कहते हैं, ‘दिग्विजय 15 सालों से प्रदेश से दूरी बनाए रखे। सिंधिया और कमलनाथ मध्य प्रदेश में रहे ही नहीं कभी। प्रदेश में इन लोगों की वास्तव में कोई ज़मीन ही नहीं है। इसलिए वे किसी भी प्रकार का नुकसान पहुंचाने की हालत में नहीं हैं।

विशेषज्ञ मानते हैं कि दिग्विजय का फायदा कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने में नहीं, जिताने में अधिक है। क्योंकि इस स्थिति में एक तो उनका बेटा राजनीति में सेटल हो सकता है और दूसरा यदि कमलनाथ मुख्यमंत्री बनते हैं तो कहीं न कहीं दिग्विजय को उनसे नज़दीकी का फायदा मिल सकता है।

इसके साथ ही उन्हें अपनी राज्यसभा की सीट भी बचानी है लेकिन, साथ ही वे स्वीकराते हैं कि यह फायदा भी दिग्विजय के अस्त होते सूरज का फिर से उदय नहीं करा सकता है।
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