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बेटी कैंसर से तड़पकर मर गई, महिला शिक्षक को GPF नहीं दिया | EMPLOYEE NEWS



जबलपुर। सरकारी विभागों में लापरवाही, असंवेदनशीलता और रिश्वतखोरी अब हत्यारे होते जा रहे हैं। एक महिला शिक्षक की बेटी कैंसर से पीड़ित थी। 5 महीने पहले उसने जीपीएफ (सामान्य भविष्य निधि) से रुपए निकालने के लिए आवेदन किया था लेकिन शिक्षा विभाग की हीला-हवाली के चलते शिक्षिका को समय पर पैसा नहीं मिला, बेटी कैंसर से तड़पते हुए मर गई। डीईओ ने प्रकरण में एक जानकारी मांगी और फाइल को संकुल के पास भेज दिया। संकुल ने वह जानकारी ही नहीं दी। महिला कर्मचारी को आपातकाल की स्थिति में पैसों की जरूरत थी परंतु डीईओ की चिट्ठी में संकुल को समय के लिए पाबंद ही नहीं किया गया। 

अप्रैल में किया था आवेदन, कई चक्कर भी लगाए
मप्र तृतीय वर्ग शासकीय कर्मचारी संघ के प्रांतीय महामंत्री योगेन्द्र दुबे ने बताया कि अधारताल संकुल के तहत आने वाले शासकीय प्राथमिक स्कूल आनंद नगर में पदस्थ शिक्षिका सुषमा तिवारी की 25 वर्षीय बेटी शगुन आचार्य कैंसर से पीड़ित थी। बेटी का इलाज कराने के लिए उन्होंने अपनी पूरी जमा पूंजी लगा दी। जीपीएफ राशि के लिए अप्रैल माह में आईएफएमआईएस की नई व्यवस्था के तहत ऑनलाइन और फिर ऑफलाइन आवेदन भी किया। जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) और ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (बीईओ) कार्यालय के कई चक्कर भी लगाए। लेकिन जीपीएफ का पैसा नहीं मिला। जिस कारण इलाज के अभाव में 22 सितंबर को शगुन की मौत हो गई।

GPF प्रकरण में DEO ने लगाई थी आपत्ति
शिक्षिका के जीपीएफ प्रकरण में मामूली सी आपत्ति थी, जिसका निराकरण जिम्मेदारों ने समय रहते नहीं किया। जिसका खामियाजा शिक्षिका को अपनी इकलौती बेटी को खोकर चुकाना पड़ा।जीपीएफ प्रकरण 5 माह तक संकुल, बीईओ और डीईओ कार्यालय के बीच घूमता रहा। 22 अगस्त को डीईओ स्तर पर यह आपत्ति लगाई गई थी कि शिक्षिका ने अपनी सेवाकाल के दौरान जीपीएफ की 90 प्रतिशत राशि निकाली है या नहीं। इसका प्रमाण-पत्र देने को कहा गया था। प्रकरण फिर संकुल कार्यालय लौटाया गया, लेकिन निराकरण नहीं किया गया। 

घूसखोरी के लिए अटकाए जाते हैं मामले
सरकारी दफ्तरों में सामान्यत: घूसखोरी के लिए प्रकरण अटकाए जाते हैं। डीईओ का अधिकार है कि वो प्रकरण पर आपत्ति लगाए परंतु उसकी जिम्मेदारी है कि वो अपने संकुल से आपत्ति का निराकरण निर्धारित अवधि में करवा ले। यदि कर्मचारी को आपातकाल की स्थिति में पैसों की जरूरत है तो उसे आवश्यक/तत्काल के तहत निपटाया जाना चाहिए। जीपीएफ कर्मचारी की अपनी पूंजी है। किसी भी अधिकारी को यह अधिकार नहीं है कि वो इसे अनिश्चितकाल तक के लिए लंबित कर दे। 

ये है डीईओ का बयान
शिक्षिका का जीपीएफ प्रकरण 22 अगस्त को आया था। जिसमें नियमानुसार यह आपत्ति लगाई गई थी कि जीपीएफ का 90 प्रतिशत राशि आहरित की है या नहीं। प्रकरण संकुल को लौटा दिया गया था।
डॉ. कामायनी कश्यप, प्रभारी डीईओ

कमिश्नर से की कार्रवाई की मांग
इधर, मप्र तृतीय वर्ग शासकीय कर्मचारी संघ ने संभाग कमिश्नर को ज्ञापन देकर जीपीएफ प्रकरण की जांच कर हीलाहवाली करने वाले बीईओ और डीईओ पर कार्रवाई की मांग की है। इस अवसर पर अर्वेन्द्र राजूपत, अवधेश तिवारी,अटल उपाध्याय आदि मौजूद रहे। 
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