जिस देश के टीचर्स को CCE ही नहीं समझता, वहां RTE का यही हश्र होना था

Updesh Awasthee
जगमोहन सिंह राजपूत। स्कूलों में हर कक्षा में वार्षिक परीक्षा होना दशकों से शिक्षा व्यवस्था का एक अपरिवर्तनीय अंग माना जाता रहा है। अंग्रेजों द्वारा भारत में रोपित की गई शिक्षा प्रणाली का यह एक महत्वपूर्ण अंग था और लगभग उसी स्वरूप में आज भी विद्यमान है। वैसे शिक्षा की मौलिक अवधारणा सदा यही रही है कि उसका हर अंग गतिशीलता को स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं, तत्पर भी रहे। शिक्षा प्रणालियों को बदलने के सफल प्रयास जिन देशों में हुए हैं वहां सोच यही रही है कि शिक्षा में किया गया निवेश राष्ट्र की प्रगति में अन्य किसी भी क्षेत्र में किए गए निवेश के बरक्स सबसे अधिक योगदान करता है। भारत की प्राथमिकताओं में ऐसी सोच व्यावहारिक स्थान नहीं पा सकी ।

परिणामस्वरूप हम आज भी शिक्षा में वे सब सुधार लागू करने की स्थिति में नहीं हैं जो कई दशक पहले लागू हो जाने चाहिए थे। कोठारी कमीशन की सबसे महत्वपूर्ण संस्तुतियों में शामिल था मूल्यांकन पद्धति में परिवर्तन। वह भी कार्य संस्कृति की शिथिलता तथा नीतिगत स्तर पर अन्यमनस्कता के कारण जहां का तहां ही रह गया। शिक्षा के मूल अधिकार अधिनियम के 2010 में लागू होने पर लोगों का ध्यान इस ओर गया कि कक्षा आठ तक कोई परीक्षा नहीं होगी और कक्षा दस की बोर्ड की परीक्षा वैकल्पिक बना दी जाएगी। यह भी घोषित किया गया कि सीसीई (समेकित और समग्र मूल्यांकन) को लागू कर दिया जाएगा। परीक्षा समाप्त करने से आशय यह तो नहीं था कि बच्चा बिना कुछ शैक्षिक उपलब्धि के ही कक्षा आठ तक निर्बाध रूप से पहुंच जाए और वहां जाकर पाए कि अब उसके सामने कोई रास्ता बचा ही नहीं है।

क्या यह विडंबना नहीं कि जिस कमजोर वर्ग को शिक्षा में आगे लाने का दम हर कोई भरता रहा, ‘फेल न करने की नीति’ से उसी वर्ग के बच्चों की शिक्षा और अधिक कमजोर होती गई? इसमें सुधार आवश्यक था। देश ने इसे पहचाना और अब किए जा रहे परिवर्तनों को उसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए। बगैर पूर्व-तैयारी के लागू किए गए सुधारों को सफलता कभी नहीं मिलती है। यहां भी वही हुआ। अंग्रेजों द्वारा सौ वर्ष पहले बिछाई गई पटरियों पर एकाएक बाहर से मंगाकर बुलेट ट्रेन चला देने का जो हश्र होगा वही इस ‘फेल न करने की नीति’ का भी हुआ। उस समय के सरकारी तंत्र ने इन प्रस्तावित परिवर्तनों के क्रियान्वयन के पहले कोई तैयारी करने की आवश्यकता नहीं समझी। इन ‘सुधारों’ को कैसे आगे बढ़ाया जाएगा, इस ओर भी ध्यान देना जरूरी नहीं माना गया। इन बहु-प्रचारित परिवर्तनों को असफल होना ही था, क्योंकि क्रियान्वयन के लिए जो सामान्य आवश्यकताएं हर स्कूल में अपेक्षित मानी जाती हैं वे उपलब्ध ही नहीं थीं।

सभी जानते हैं कि आज भी देश के लगभग नब्बे प्रतिशत सरकारी प्राथमिक विद्यालय शिक्षा का अधिकार अधिनियम के प्रावधानों पर खरे नहीं उतरते हैं। नियमानुसार तो ऐसे सभी स्कूलों की मान्यता समाप्त हो जानी चाहिए। आज भी देश के 37 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में बिजली के कनेक्शन ही नहीं हैं। जहां हैं भी वहां पता नहीं कि कितने वास्तव में चालू हैं या शुल्क न भरने के कारण काट दिए गए हैं? क्या समुचित अनुपात में प्रशिक्षित अध्यापकों की उपस्थिति के बगैर कोई स्कूल सतत तथा समग्र मूल्यांकन लागू कर सकता है और यदि यह लागू होने की स्थिति ही नहीं बनती है तो बच्चों की शैक्षिक उपलब्धि को कैसे जाना जाएगा? चूंकि यह संभव था ही नहीं अत: साल दर साल बच्चे बगैर कोई शैक्षिक उपलब्धि हासिल किए केवल अगली कक्षा में प्रोन्नत होते रहे। चूंकि उनमें अधिकांश उन परिवारों के थे जहां घर पर भी उनकी शैक्षिक सहायता या उनकी शिक्षा पर ध्यान देने की परिस्थिति नहीं होती इसलिए कुल मिलाकर बच्चे कहीं के नहीं रहे। वे बिना किसी शैक्षिक उपलब्धि के ही अगली कक्षाओं में जाते रहे। आठवीं या कक्षा दस की बोर्ड परीक्षा में उनके पास नकल ही एकमात्र विकल्प रह गया। इसके लिए उन्हें नकल माफिया की शरण में जाना भी एक रास्ता दिखाई दिया। 

बिहार में पिछले वर्ष जब नकल रोकने में सख्ती की गई तो बोर्ड परीक्षा का परिणाम 35 प्रतिशत पर आ गया। इस गंभीर स्थिति के निर्माण में निश्चित रूप से ‘फेल न करने की नीति’ का काफी योगदान था। क्या कोई राष्ट्र और उसका शिक्षा तंत्र इस प्रकार की स्थिति को स्वीकार कर सकता है? यदि नीति-निर्माताओं ने स्कूलों की वस्तुस्थिति पूरी तरह विश्लेषित की होती तो संभवत: उनकी प्राथमिकता पहले स्थिति सुधारने की होती, न कि एकाएक अपना निर्णय सारे देश पर थोप देने की। क्या यह हास्यास्पद नहीं कि सीबीएसई ने अपने से संबद्ध स्कूलों के प्राचार्यो को केवल एक दिन का प्रशिक्षण देकर सीसीई लागू करने की तैयारी की खानापूर्ति कर दी। जैसा अपेक्षित था, यह नीति असफल रही और अब इसे बदला जा रहा है।

अब नई नीति के अनुसार कक्षा पांच के बाद परीक्षा लेने के प्रावधान को लागू करने या न करने की छूट राज्य सरकारों को मिली हुई है। कक्षा पांच के पहले कोई वार्षिक परीक्षा नहीं होगी। यहां यह जान लेना आवश्यक है कि कक्षा दस की बोर्ड परीक्षा को वैकल्पिक बनाने की छूट को किसी भी स्कूल बोर्ड ने स्वीकार नहीं किया था। यह एक तथ्य है कि इस प्रकार के निर्णयों में भागीदारी करनेवालों में अधिकांश वही लोग होते हैं जिनके बच्चे बड़े नामवाले निजी स्कूलों से पढ़े होते हैं। शायद वे यह भूल जाते हैं कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे प्रांतों में लाखों अध्यापकों के पद रिक्त हैं और लाखों शिक्षाकर्मी बिना शिक्षक पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण किए ही अध्यापन कर रहे हैं।

हाल में देश में 11 लाख अप्रशिक्षित अध्यापकों को प्रशिक्षित करने का निर्णय लिया गया है। आशा करनी चाहिए कि यह केवल खानापूर्ति नहीं होगी। जैसे-जैसे अध्ययन और अध्यापन की वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक समझ बढ़ी है, परीक्षा एक अनावश्यक अवरोध के रूप में मानी जाने लगी है। आज आधुनिक और गतिशील शिक्षा की इस अवधारणा से कोई मतभेद नहीं हो सकता है कि किसी बच्चे का सर्वोत्तम मूल्यांकन केवल वह अध्यापक ही कर सकता है जिसने उसको पढ़ाया हो। उस स्थिति तक पहुंचाने के लिए हर स्कूल को भौतिक तथा मानवीय पक्षों पर संवारना और सुधारना होगा।
लेखक जगमोहन सिंह राजपूत एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक हैं। 

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