आदिवासी समाज ने उसे नेहरू की पत्नी मानकर बहिष्कृत कर दिया

13 November 2016

धनबाद। 57 साल पहले हुआ एक घटनाक्रम आदिवासी महिला के लिए जिंदगी भर का नासूर बन गया। पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ बांध का उद्घाटन करने वाली भारत की महिला मजदूर महिला के लिए यह कार्यक्रम जिंदगी भर का नासूर बन गया। उसे उसके अपने समाज और गांव से बहिष्कृत कर दिया गया। आज तक वो दर दर की ठोकरें खा रही है। आदिवासी समाज उसे पंडित जवाहर लाल नेहरू की पत्नी कहता है जबकि नेहरू को अपनी जिंदगी में कभी इस घटनाक्रम का पता ही नहीं चला। 

उस दिन आखिरी बार मुस्कुराई थी बुधनी
6 दिसंबर 1959 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू पश्चिम बंगाल के खोरबोना गांव में बांध का उद्घाटन करने गए थे। नेहरू के आग्रह पर बांध का उद्घाटन 15 साल की बुधनी से कराया गया था। वो भारत की पहली मजदूर थी, जिसके हाथों से किसी प्रोजेक्ट का उद्घाटन हुआ था। बस, यही वो आखिरी दिन था, जब बुधनी के चेहरे पर खुशी दिखी थी। बुधनी उस दिन अपने पारंपरिक लिबास में सज-धज कर अपने पीएम का स्वागत करने पहुंची थी।

...और पंचायत ने गांव, समाज से कर दिया बाहर
उद्घाटन समारोह के दौरान नेहरू ने बुधनी के हाथों में स्वागत के लिए लाया गया हार थमा दिया था। बस, ये पल बुधनी की जिंदगी में तूफान साबित हुआ। रात में गांव में संथाली समाज की पंचायत बैठी। बुधनी को कहा गया कि पंडित नेहरू ने उसे माला दी है, इसलिए आदिवासी परंपरा के मुताबिक वो उनकी पत्नी हो गई है। क्योंकि, पंडित नेहरू आदिवासी नहीं थे, इसलिए एक गैर-आदिवासी से शादी रचाने के आरोप में संथाली समाज ने उसे जाति और गांव से बाहर निकालने का फैसला सुना दिया।

बुधनी उस समय दामोदर वैली कॉरपोरेशन (डीवीसी) में मजदूरी करती थी। कुछ समय तक वहीं नौकरी करती रही, लेकिन 1962 में उसे वहां से भी निकाल दिया गया। इसके बाद वो बंगाल छोड़कर बिहार (अब झारखंड) आ गई। 

अब तक समाज में खोज रही अपना सम्मान
1985 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी को बुधनी-नेहरू के किस्से की जानकारी मिली थी। बुधनी ने बताया-राजीव गांधी के बुलावे पर वो उनसे मिलने ओडिशा गई थी। इसके बाद डीवीसी ने उन्हें फिर से नौकरी पर रख लिया था। अब वो रिटायर हो चुकी है। उसने बताया कि गांव से निकाले जाने के कई सालों बाद वो अपने घर गई थी। परिवार से मिलकर चली आई थी। अब पर्व-त्योहार पर ही गांव जाती है। परिवार के सदस्यों को छोड़ अन्य किसी से बात नहीं होती। उन्हें आज भी समाज के आंखों में अपने लिए सम्मान का इंतजार है।

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