मप्र में बिल्डर्स की मनमानी पर लगाम, रियल एस्टेट बिल लागू

Wednesday, October 26, 2016

भोपाल। बिल्डर या डेवलपर अपने प्रोजेक्ट में जो वादा करेंगे उन्हें उसे निभाना भी पड़ेगा। केंद्र सरकार द्वारा मई 2016 में लागू कानून के आधार पर मप्र सरकार ने रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी के गठन से संबंधित नियम जारी कर दिए। बिल्डर और प्रमोटर को अपने हर प्रोजेक्ट का अथॉरिटी में रजिस्ट्रेशन कराना होगा। रजिस्ट्रेशन के बाद ही वह प्रोजेक्ट में बिक्री शुरू कर सकेगा।

1. बिल्डर्स को स्पष्ट रूप से यह बताना होगा कि उसके प्रोजेक्ट में क्या-क्या सुविधाएं होंगी।
2. प्रोजेक्ट की लागत, ग्राहकों से वसूली जाने वाली कीमत और उनके साथ किए जाने वाले एग्रीमेंट की जानकारी भी देना होगी।
3. प्रोजेक्ट की कौन सी स्टेज कितने समय में पूरी होगी।
4. इसी आधार पर बिल्डर द्वारा ग्राहक से ली जाने वाली किस्त तय होगी।
5. स्ट्रक्चर बदलने की अनुमति के लिए 66 प्रतिशत ग्राहकों से अनुमति लेना होगी।
6. डेवलपर, प्रमोटर को हर प्रोजेक्ट का रजिस्ट्रेशन कराना होगा।
7. अथॉरिटी ग्राहकों के भुगतान की 70 प्रतिशत राशि से एक एस्क्रो फंड बनाएगी। 
8. यह सुनिश्चित होने पर कि बिल्डर ने वायदे के अनुसार कंस्ट्रक्शन किया है उसे इस एस्क्रो फंड से भुगतान होगा 
9. वादा पूरा नहीं करने पर अथॉरिटी बिल्डर पर जुर्माना लगा सकेगी। एक्ट में तीन साल की जेल तक का प्रावधान है।
10. ग्राहक एक निश्चित फार्मेट में बिल्डर के खिलाफ शिकायत कर सकेंगे।
11. अथॉरिटी में अपीलीय प्राधिकरण भी होगा। 
12. प्रोजेक्ट में किसी प्रकार का विलंब होने पर अथॉरिटी से उसकी अनुमति लेना होगी। 
13. 1000 वर्ग मीटर तक के आवासीय प्रोजेक्ट के लिए 10 रुपए, इससे बढ़े प्रोजेक्ट के
लिए 50 रुपए और कमर्शियल प्रोजेक्ट के रजिस्ट्रेशन के लिए 50 रुपए प्रति वर्ग मीटर फीस तय की गई है।

अब तक कैसी शिकायतें ...
बिल्डर, प्रमोटर या एजेंट जो वादा करते हैं उसके हिसाब से कंस्ट्रक्शन नहीं होता।
खास तौर से विज्ञापन में बिल्डर सुविधाओं के बारे में बड़े- बड़े वायदे करते हैं लेकिन यह प्रोजेक्ट का हिस्सा नहीं होते। 
मटेरियल अथवा लेबर महंगा होने की बात कहकर बिल्डर बीच में ही कीमत बढ़ा देते हैं।
अक्सर जो समय बताते हैं उसके हिसाब से प्रोजेक्ट के काम नहीं होते 
एग्रीमेंट में ऐसी शर्तें रख देते हैं कि ग्राहक बिल्डर के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर पाता।
खासतौर से पजेशन, मेंटेनेंस चार्ज, स्ट्रीट लाइट, सड़क, पार्क, लिफ्ट, पार्किंग, क्लब हाउस जैसी सुविधाओं को लेकर बिल्डर और ग्राहक के बीच विवाद की स्थिति रहती है।

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