राकेश दुबे@प्रतिदिन। देश में आजकल एक ही सवाल पर बहस चल रही है कि क्या इस देश का माहौल ख़राब है? इस बहस को सबसे पहले देश के कुछ कथित बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों और फिल्मकारों ने शुरू किया जिसके बाद अवॉर्ड लौटाने के फैशन ने ज़ोर पकड़ा और इस विरोध को ज़िंदा रखने वाली ऑक्सीज़न देने के लिए सोनिया गांधी और उनकी कांग्रेस पार्टी सड़क पर उतर गई।
सवाल ये है कि देश के माहौल को ख़राब बताने वालों ने क्या कभी देश की उस हवा के बारे में बात की है जिस हवा में आप और हम सांस लेते हैं। सवाल ये है कि कोई पार्टी देश में ख़तरनाक प्रदूषण पर प्रोटेस्ट क्यों नहीं करती? देश में प्रदूषण और उससे होने वाली मौतों पर कोई रैली क्यों नहीं निकाली जाती? देश के माहौल को ख़राब बता कर राजनीति करना आसान है। देश के माहौल को ख़राब बताकर पब्लिसिटी पाना आसान है लेकिन सवाल ये है कि हमारे नेताओं, बुद्धिजीवियों, फिल्मकारों और सरकारों को कभी देश की हवा पर बात करने का ख्याल क्यों नहीं आता?
हमें लगता है कि ख़राब माहौल पर राजनीति करने से लोगों का भला नहीं होगा। लोगों का भला उस हवा को ठीक करने से होगा जिसमें हम सांस लेते हैं। जिस दिल्ली में सोनिया गांधी और कांग्रेस के नेता देश के माहौल को ख़राब बता कर प्रदर्शन कर रहे थे, उसी दिल्ली की हवा आम लोगों के लिए कितनी ख़तरनाक हो चुकी है। इसका अहसास हमारे नेताओं को नहीं है। आज दिल्ली दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर के तौर पर बदनाम है। इस बात को सुनकर हमारे नेताओं को कभी शर्म नहीं आती। ये हमारे समाज, राजनीति और बुद्धिजीवी वर्ग की सोच का एक बहुत बड़ा विरोधाभास है जिसका आज विश्लेषण करना बहुत ज़रूरी है। हमारे देश में प्रदूषण को कोई मुद्दा नहीं मानता। कोई पार्टी इसे अपने मैनीफेस्टो में जगह नहीं देती लेकिन हमें लगता है जिस हवा में पूरा देश सांस ले रहा है, उस हवा की गुणवत्ता देश के लिए एक ज़रूरी मुद्दा है। इसीलिए हमने देश के उस माहौल के विश्लेषण का फैसला किया है जो प्रदूषित हवा की वजह से बन रहा है।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
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