आतंकवाद : भारत का जागना जरूरी है

राकेश दुबे@प्रतिदिन। पाकिस्तान और ऑस्ट्रेलिया की घटनाओं ने दुनिया के साथ भारत की चिंता ज्यादा  बढ़ा दी है। पाकिस्तान की घटना तो दरिंदगी की इंतहा है। आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने हमले की जिम्मेदारी ली है और इसे बदले की कार्रवाई बताया है।

पाकिस्तानी फौज ने पिछले 6 महीने के अंदर 1200 से ज्यादा आतंकियों को मार गिराया है। इस समय दुनिया भर के आतंकवादी संगठन अपने को नए सिरे से संगठित करने और अपनी ताकत बढ़ाने में जुटे हैं। अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की विदाई को करीब मानकर तालिबानी अपने को फिर से खड़ा करने में लगे हैं।

भारत में इसका असर ज्यादा महसूस किया जा रहा है। कश्मीर में प्रदर्शन, कुछ भारतीय युवकों के उसमें शामिल होने के लिए इराक जाने और बेंगलुरु में आईएसआईएस का ट्विटर हैंडल करने वाले मेहदी मसरूर बिस्वास की गिरफ्तारी से इस तरह की आशंका गहराने लगी है कि कहीं आईएसआईएस भारत को अपना निशाना न बना ले।

लेकिन भारत  की सरकार ने सुरक्षा तंत्र को  26/11 बाद के  मुस्तैद बनाने के लिए कई तरह की व्यवस्थाएं तो  की पर कुल मिलाकर वे ढीली-ढाली ही हैं।उस समय तय हुआ था कि नैशनल सिक्यॉरिटी गार्ड्स (एनएसजी) की देश भर में तीन-चार इकाइयां बनाई जाएंगी। इस दिशा में थोड़ा-बहुत काम हुआ भी, लेकिन राज्यों से पर्याप्त सहयोग न मिलने के कारण यह पूरा नहीं हो पाया। 

राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र (एनसीटीसी) की स्थापना अब तक नहीं हो पाई है। यह मामला भी केंद्र-राज्य टकराव की भेंट चढ़ चुका है। 26/11 के समय कई उपकरण लगाए गए, जो आज की तारीख में बेकार पड़े हैं। विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी अक्सर उजागर होती रहती है। वक्त आ गया है कि हम अपनी आतंकवाद विरोधी मशीनरी को दुरुस्त करें और हमलों के लिए मानसिक तौर पर तैयार रहें।

लेखक श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703
rakeshdubeyrsa@gmail.com


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