गुड़िया रेपकांड में औपचारिकता निभा आए नेताप्रतिपक्ष: शर्म करो श्रीमान

shailendra gupta
उपदेश अवस्थी@लावारिस शहर।  जो रवैया चीन के मामले में केन्द्र का है वही रवैया मध्यप्रदेश में शिवराज सरकार का बलात्कारियों के प्रति, लेकिन जाएं तो जाएं कहां। विपक्ष भी तो अब औपचारिक विरोध ही जताया करता है। मैं बात घंसौर की 'गुड़िया' के मामले में विपक्ष की भूमिका की कर रहा हूं। विपक्ष ने इस मामले में शर्मनाक प्रदर्शन किया है।

जिस सुबह अखबारों में गुड़िया की मौत की खबर आई, हर पढ़ने वाले की रूह कांप गई। मासूम बच्चे चाहे अपने हों या पराए, लगाव सभी को होता है। लोगों से सुबह का नाश्ता नहीं हो पाया। पूरा प्रदेश दर्द से कराह हुआ।

उम्मीद थी कि दिनचर्या शुरू होने से पहले कांग्रेस पूरे प्रदेश में शिवराज के खिलाफ प्रदर्शन करेगी। तमाम नेता जहां हैं, वहीं धरने पर जम जाएंगे। शिवराज सरकार की जड़ें हिला दी जाएंगी, लेकिन अफसोस ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

भूरिया तो भूरिया हैं, कभी मध्यप्रदेश के हित में कोई आंदोलन किया ही नहीं, विपक्ष में जरूर हैं परंतु धरना और आमरण अनशन जैसे क्रियाकलाप उन्हें रास नहीं आते। कांग्रेस में राजनीति की शुरूआत की। अपना और अपनों का काम कैसे निकलवाएं इस मामले में पीएचडी हो सकती है परंतु जनहित के विषय पर सरकारों को प्रेशर में कैसे लिया जाए, इन कक्षाओं में वो सदैव अनुपस्थित ही रहे।

बात यदि सिंधिया की करें तो वो भी ग्लेमराइज्ड पॉलिटिक्स ही कर सकते हैं। वो दहाड़ दहाड़ कर कह सकते हैं कि मैं आपको शिवराज से ज्यादा अच्छी सरकार दूंगा, लेकिन 'मैं शिवराज को अच्छी सरकार चलाने पर मजबूर कर दूंगा।' यह बयान उनके श्रीमुख से निकल ही नहीं सकता। राजघराने के युवराज हैं, विरोधियों को निपटाना आता है, चाणक्य की तरह मगध के मनमुग्ध राजा के खिलाफ जनसमर्थन हासिल करने का तप कर ही नहीं सकते।

थोड़ी बहुत उम्मीद नेताप्रतिपक्ष अजय सिंह से थी। अच्छा परफार्म कर रहे थे, परंतु  घंसौर की गुड़िया के मामले में तो ऐसा लगा माना उन्होंने भी 'विरोध न करने के लिए सुपारी ले ली हो।' पता नहीं कैसे उस सुबह इनके गले से निवाला उतरा होगा। एक मासूम का दर्द क्या पता कैसे ये अपने भीतर फील नहीं कर पाए। चुपचाप बैठे रहे, अपने दिनभर के कामकाज निपटाए और एक प्रेसरिलीज जारी कर दिया, बस।

अब सिवनी के दौरे पर गए तो मौका ताड़कर घंसौर जा पहुंचे। घड़ियाली आंसू बहाने। लौटकर बयान जारी कर रहे हैं, पीड़ित के परिवारवालों को 10 लाख की सहायता दी जानी चाहिए।

कोई पूछे माननीय महोदय से, क्या एक मासूम के साथ रेप और निर्मम हत्या की कीमत 10 लाख रुपए होती है। आईजी और एसपी से रिश्तेदारी क्या है जो उनकी बर्खास्तगी तक धरना शुरू नहीं किया गया। गजब हो गया, जमीनी विरोध तो दूर की बात, जिस लापरवाह पुलिस प्रशासन के कारण बलात्कारियों के हौंसले बुलंद हैं, उनके खिलाफ बयान तक जारी नहीं किया।

क्या मचा रखा है मध्यप्रदेश में, मामला एक मासूम की मौत का है। यदि शिवराज सरकार से कोई अंडरटेबल समझौता हो गया है तो चुप रहिए, कम से कम इस मामले को रुपयों में तो मत तौलिए।

इतना निर्लज्ज नहीं हो सकता इंसान, कुछ तो शर्म करो श्रीमान।

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