राकेश दुबे@प्रतिदिन। निश्चित ही देश के वे नेता अत्यंत सरल रहे होंगे,जिन्होंने अपने पडौसी देश से भाईचारे के रिश्ते निभाने की बात कही होगी , पर शायद उन्हें यह नहीं मालूम होगा कि जिन्हें वे भाई कह रहे है , वे धोखेबाज़ और मक्कार है।
और शायद उनने कभी यह कल्पना भी नहीं की होगी भारत में 2013 में भारत में एक ऐसा प्रधानमंत्री भी होगा जो गुस्से में मिमियाता भर हो । नहीं तो मजाल थी कोई भारत के सैनिकों के सर उतार ले जाता, कोई 19 किलोमीटर भीतर आकर कैम्प लगा लेता है , कोई घुसपैठियों की खेप पर खेप भेज रहा है ,किसी के हाथ सरबजीत के खून से रंग गये है और हम सिर्फ निंदा कर रहे हैं । लानत है।
हम पडौसियों के लिए अजमेर शरीफ का जन्नती दरवाज़ा खुलवाते है भर पेट बिरयानी खिलते हैं। मेहमानों को ही नहीं मुजरिमों को भी। कहीं तो गडबड है।
शांतिकाल में सांस्कृतिक समझौते करते हैं । वक्त पढने पर बांग्लादेश हो या श्रीलंका शांतिसेना भेज कर मदद करते हैं। आज सब सरकार से सवाल पूछ रहे है। आम आदमी इनसे उनसे अर्थात पुराने उप प्रधानमंत्री पुराने रक्षा मंत्री और केंद्र सरकार के हिस्से रहे या हैं से पूछता है आप कहाँ थे ? और अब आलोचना किस मुँह से कर रहे हैं।
आज जरूरत है सरकार इधर-उधर की बात न कर, देश की विदेश नीति पर फौरन सर्वदलीय बैठक बुलाये और विचार करे कि पाकिस्तान बाग्लादेश ,चीन और श्रीलंका से हमारे रिश्ते कैसे हो । सामरिक शक्ति जवाब के लिए तैयार रखे और मेहमान नवाजी के खाते कुछ साल के लिए बंद कर दे ।
