मजबूरी में कई किताबें पढ़ डाली थीं इसलिए DSP बन गई

Thursday, June 8, 2017

भोपाल। ज्यादातर लोग किताबें नहीं पढ़ते, कुछ शौक के लिए पढ़ते हैं परंतु अनूपपुर से बालिका वधु बनाकर विदा कर दी गई अनिता प्रभा शर्मा ने मजबूरी में किताबें पढ़ीं। अनिता के पास पैसे नहीं थे। इसलिए वो अपने कमरे से बाहर नहीं निकली थी। कुछ किताबें रखीं थीं। वक्त गुजारने के लिए वही पढ़ा करती थी। इसी अध्ययन की बदौलत अनिता ने एमपीपीएससी की परीक्षा पास कर ली। अब वो डीएसपी बनने वाली है। 15 जून से उसकी ट्रेनिंग शुरू हो रही है। 

कोतमा की रहने वाली अनिता बताती हैं कि, मेरे पास इतने भी पैसे नहीं होते थे कि मैं बाजार से अपने लिए कुछ खरीद सकूं। इसीलिए दिन भर एक कमरे में बैठकर अलग-अलग किताबें पढ़ती थी। अब आप इसे पढ़ने का शौक कह लीजिए आदत या मजबूरी। हालांकि मुझे उस वक्त से आज भी कोई शिकायत नहीं है, क्योंकि उस वक्त ने मुझे हर बार बेहतर स्थिति के लिए तैयार किया है। मेहनत और लगन की वजह से मुझे पहले सूबेदार फिर एसआई और अब डीएसपी रैंक मिली है।

बदलाव जो जरूरी है
मैंने समाज बदलने के लिए नहीं, बल्कि लोगों की मदद के लिए सिविल सर्विस को चुना है। मैंने कई बार ये देखा है कि लोग अपने साथ हो रहे अन्याय, अत्याचार को लेकर पुलिस के पास आने और एफआईआर लिखवाने से डरते हैं। मैं लोगों के मन से वो डर खत्म करना चाहती हूं। लोगों को बताना चाहती हूं कि पुलिस उनकी मदद के लिए है। पुलिस विभाग के प्रति लोगों की सोच में बदलाव लाना चाहती हूं।

उदाहरण बनाना चाहती थी
मेरे माता-पिता दोनों टीचर रहे हैं लेकिन, परिवार में शुरू से ही बेटियों और बेटों को लेकर अलग-अलग मानसिकता थी। चूंकि मैं पढ़ाई में काफी अच्छी रही थी इसलिए घर में कम महत्व मिलने से थोड़ी दुखी रहती थी। कम उम्र में ही बहन की शादी हो गई, जिसकी वजह से उनसे भी ज्यादा अटैचमेंट रहा नहीं।

तलाक मेरा अचीवमेंट नहीं था
परंपरा के अनुसार कम उम्र में मेरी भी शादी कर दी गई थी। धीरे-धीरे मुझे अहसास हुआ कि उम्र के अंतर के कारण हमारे बीच सामंजस्य इतना अच्छा नहीं है। किंतु परिवार और पेरेंट्स की प्रतिष्ठा ने कुछ वक्त तक मुझे उस जीवन में बनाए रखा। हालांकि दोनों की खुशी और अपना लक्ष्य पूरा करने के लिए मैंने तलाक ले लिया। मैं अपने तलाक को अचीवमेंट के तौर पर नहीं बताना चाहती। बस यही कहना चाहती हूं कि लड़कियों को पढ़ने और आगे बढ़ने से मत रोकिए।

अनिता के संघर्ष की कहानी
मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले के कोतमा में 1992 में शर्मा परिवार के घर जन्मी अनिता ने कम उम्र में की जीवन के कई उतार-चढ़ाव देख लिए हैं। दूसरे प्रयास में वे कठिन फिजिकल टेस्ट पास कर सब-इंस्पेक्टर के लिए चुन ली गईं, जबकि दो महीने पहले ही उन्हें ओवरी में ट्यूमर के कारण सर्जरी करवानी पड़ी थी। फिर उन्होंने बतौर सूबेदार जिला रिजर्व पुलिस लाइन में जॉइन किया। ट्रेनिंग के लिए सागर भेजा गया, इसके बाद उन्होंने डाइवोर्स की प्रकिया को भी आगे बढ़ाया। इस ट्रेनिंग के दौरान ही मध्यप्रदेश स्टेट पब्लिक सर्विस कमीशन परीक्षा के रिजल्ट आए, जिसमें वे पहले शामिल हुई थीं, इसमें वे डीएसपी सिलेक्ट हो गईं। पहले ही प्रयास में महिलाओं में वे 17वें स्थान पर आईं और सभी कैटेगरी में वे 47वें नंबर पर रहीं। 

अप्रैल 2016 में उन्होंने यह परीक्षा पास कर ली और इसका इंटरव्यू मार्च 2017 में हुआ है। रिजल्ट के बाद उन्हें डीएसपी रैंक मिल गई, जिसकी एक साल की ट्रेनिंग 15 जून से भौंरी में होगी। यह सबकुछ उन्होंने किया है, सिर्फ 25 साल की उम्र में। यह उपलब्धियां उन्होंने हासिल की हैं बिना किसी मदद के। जिसमें उनके पेरेंट्स भी शामिल हैं। खराब शादी के कारण उनके बेटी के साथ अब बातचीत के संबंध भी नहीं हैं।

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