गोविंद बल्लभ पंत: एक ब्राह्मण क्रांतिकारी जिसने कई प्रथाएं तोड़ीं, नए कानून बनाए

Monday, March 6, 2017

पंडित गोविंद बल्लभ पंत एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी और आधुनिक भारत के निर्माताओं में से एक थे। वह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति थे। उन को संयुक्त प्रांत जो अब उत्तर प्रदेश के रूप में जाना जाता है का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक नेता माना जाता था।

गोविंद बल्लभ पंत 10 सितंबर 1887 को अल्मोड़ा में श्याही देवी पहाड़ी की ढलानों पर बसे खूँट गांव में एक ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे। उनकी माता का नाम गोविंदी बाई था। उनके पिता मनोरथ पंत एक सरकारी अधिकारी थे और लगातार दौरों पर रहते थे। इसलिए गोविंद जी को उनके नाना, बद्री दत्त जोशी, ने पाला था जो एक महत्वपूर्ण स्थानीय सरकारी अधिकारी थे। जोशी जी ने पंत जी के व्यक्तित्व और राजनीतिक विचारों की रचना में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

गोविंद बल्लभ पंत वकील बने और काशीपुर में वकालत शुरू की। उन्होंने स्थानीय राजनीति में प्रवेश किया और कई अनुचित स्थानीय ब्रिटिश कानूनों का विरोध किया। वह 1921 में आगरा और अवध संयुक्त प्रांत की विधान सभा के लिए चुने गए। पंत जी को कांग्रेस पार्टी ने 9 अगस्त 1925 के काकोरी ट्रेन डकैती मामले में शामिल राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ाँ और अन्य क्रांतिकारियों का मुकदमा लड़ने के लिए नियुक्त किया।

नमक मार्च का आयोजन किया 
उन्हें 1930 में महात्मा गांधी की प्रेरणा से नमक मार्च का आयोजन करने की वजह से गिरफ्तार कर लिया गया और कई हफ्तों के लिए जेल में बंद कर दिया गया। सरकार ने कांग्रेस पार्टी पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस के बावजूद गोविंद बल्लभ पंत ने उस के सत्र में भाग लिया। इस लिए 1933 में उन को सात महीनों के लिए जेल में डाल दिया गया।

संयुक्त प्रांत के मुख्यमंत्री बने 
वह 1934 में कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में विधान सभा के लिए चुने गए। कांग्रेस के नेता उनके राजनीतिक कौशल से प्रभावित थे और उनको विधानसभा में कांग्रेस पार्टी का उप नेता बनाया गया। गोविंद बल्लभ पंत 1937 से 1939 तक संयुक्त प्रांत के मुख्यमंत्री रहे। उन को 1940 में सत्याग्रह आंदोलन में हिस्सा लेने की वजह से गिरफ्तार किया गया। उन को 1942 में भारत छोड़ो प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने की वजह से फिर से गिरफ्तार कर लिया गया और कांग्रेस कार्य समिति के अन्य सदस्यों के साथ मार्च 1945 तक अहमदनगर किले में रखा गया। 

हिंदू कोड बिल पारित, एकपत्नीत्व को अनिवार्य
कांग्रेस पार्टी ने 1945 में उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव जीता और गोविंद बल्लभ पंत फिर से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और 1947 में भारत की आजादी के समय भी इसी पद पर थे। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में उनकी मुख्य उपलब्धि यह है कि उन्होंने जमींदारी प्रथा का उन्मूलन किया। उन्होंने हिंदू कोड बिल पारित करके हिंदू पुरुषों के लिए एकपत्नीत्व को अनिवार्य बना दिया और हिन्दू महिलाओं को तलाक और पैतृक संपत्ति में विरासत का अधिकार दिया। उन को 1955 में लखनऊ से नई दिल्ली लाया गया और 3 जनवरी 1955 को पोर्टफोलियो के बिना केंद्रीय मंत्री बनाया गया।

हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाया 
वह 1955 से 1961 तक केंद्रीय गृह मंत्री रहे। केंद्रीय गृह मंत्री के रूप में उनकी मुख्य उपलब्धि भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन है। केंद्र सरकार और कई राज्यों में हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाना भी उन का एक बड़ा कारनामा है। उन को 26 जनवरी 1957 को सबसे बड़े भारतीय नागरिक सम्मान, भारत रत्न, से सम्मानित किया गया। उन का 7 मार्च 1961 को एक मस्तिष्क स्ट्रोक से 74 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उस समय वह भारत के गृह मंत्री थे।

देश में राष्ट्रीय महत्व के कई संस्थानों के नाम उन के नाम पर रखे गए हैं। नई दिल्ली में गोविंद बल्लभ पंत अस्पताल, इलाहाबाद में गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान और पंतनगर में कृषि एवं प्रौद्योगिकी गोविंद बल्लभ पंत विश्वविद्यालय ऐसे कुछ संस्थान हैं।  उनके पुत्र, कृष्ण चंद्र पंत, भी एक राजनीतिज्ञ और केंद्रीय मंत्री थे। 
(जीआरएनएफ) GRNF

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