नई दिल्ली, 26 सितंबर 2026: संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में नेपाल के प्रधानमंत्री श्री बालेंद्र शाह ने पिछले दिनों हुई तबाही को, अपने देश की लोकल त्रासदी मानने से इनकार करते हुए कहा कि इसके लिए सारी दुनिया जिम्मेदार है। नेपाल के प्रधानमंत्री ने मर्यादापूर्वक संसदीय शब्दों का प्रयोग किया लेकिन, शब्दों के पीछे का दर्द यह था कि, जलवायु पूरी दुनिया के बड़े देशों ने खराब की, और इसके कारण मेरा देश बर्बाद हो गया। अब मुझे अपने देश के विकास के लिए लोन नहीं चाहिए बल्कि 5 अरब डॉलर की ग्रांट चाहिए।
लोन नहीं मुआवजा चाहिए: नेपाल ने दुनिया से कहा
26 अगस्त को नेपाल के पहाड़ी क्षेत्रों में आई भीषण बाढ़, भूस्खलन और मलबे के बवंडर में कम से कम 1,400 लोगों की जान जा चुकी है और 66,000 से अधिक लोग सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं। नेपाल सरकार के शुरुआती आंकलन के अनुसार, देश को भौतिक पुनर्निर्माण और रिकवरी के लिए अपनी पूरी जीडीपी के लगभग 10 प्रतिशत यानी 5 अरब डॉलर से अधिक की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री शाह ने इस स्थिति को 'डेवलपमेंट इमरजेंसी' बताते हुए कहा कि वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 0.1 प्रतिशत से भी कम योगदान देने वाले देश पर आपदाओं के कारण कर्ज का बोझ बढ़ाना अन्यायपूर्ण है। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रभावित देशों को नए ऋणों के बजाय पर्याप्त ग्रांट-बेस्ड (अनुदान आधारित) वित्तीय सहायता मिलनी चाहिए।
'लॉस एंड डैमेज फंड' की अपर्याप्तता और कर्ज पर रोक की मांग
नेपाल को अंतरराष्ट्रीय 'लॉस एंड डैमेज फंड' से महज 20 मिलियन डॉलर मिलने की उम्मीद है। हालांकि, इस फंड में वर्तमान में केवल 300 मिलियन डॉलर ही उपलब्ध हैं, जबकि कुल जरूरतों के मुकाबले यह राशि बेहद छोटी है।
इस बीच, बोस्टन यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञ ऋषिकेश राम भंडारी के अनुसार, नेपाल को रिकवरी के लिए वर्ष 2027 में विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक (ADB) को दिए जाने वाले 400 मिलियन डॉलर के कर्ज भुगतान पर अस्थायी रोक (Debt Pause) मिलनी चाहिए, ताकि इस राशि का उपयोग देश के पुनर्निर्माण में किया जा सके।
भारत, नेपाल और चीन के बीच त्रिस्तरीय 'हिमालय क्लाइमेट रेजिलिएंस मैकेनिज्म' का प्रस्ताव
जलवायु परिवर्तन के कारण पिघलते परमाफ्रॉस्ट और कमजोर होते ग्लेशियरों का प्रभाव नेपाल-चीन सीमा से आगे भारत तक पहुंच रहा है। इस सीमा-पार खतरे से निपटने के लिए नेपाल ने भारत, चीन और नेपाल के संयुक्त नेतृत्व में 'हिमालय क्लाइमेट रेजिलिएंस मैकेनिज्म' स्थापित करने का प्रस्ताव रखा है। इस मैकेनिज्म के तहत निम्नलिखित प्रमुख कदम शामिल हैं:
- सैटेलाइट डेटा और तकनीकी विशेषज्ञता साझा करना।
- खतरनाक ग्लेशियल झीलों (Glacial Lakes) की निरंतर निगरानी।
- साझा अर्ली वार्निंग (पूर्व चेतावनी) प्रणाली को मजबूत करना।
- आपदा के समय सीमा-पार तुरंत सहायता का समन्वय करना।
वैश्विक नेताओं की चिंता और जलवायु न्याय के तीन सवाल
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेस ने इस संकट पर चिंता व्यक्त करते हुए चेतावनी दोहराई कि "दुनिया की छतें (हिमालय) ढह रही हैं"। वहीं, तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोआन ने आगामी COP31 को 'इम्प्लीमेंटेशन सीओपी' बनाने का आह्वान किया। नेपाल के प्रधानमंत्री ने जलवायु न्याय (Climate Justice) को तीन मूलभूत प्रश्नों से जोड़ा है:
- आपदा का असली नुकसान कौन उठा रहा है?
- वैश्विक निर्णय लेने वाली मेज पर किसकी आवाज सुनी जाती है?
- आने वाली पीढ़ियों के हितों की रक्षा कैसे होगी?
नेपाल ने अपने क्षेत्र के लगभग आधे हिस्से में जंगलों को पुनर्स्थापित कर, जलविद्युत और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को बढ़ावा देकर अपनी जिम्मेदारी निभाई है। हालांकि, केवल आपदा आने के बाद राहत देना पर्याप्त नहीं होगा; अब वैज्ञानिक निगरानी और रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर की सख्त जरूरत है।

