प्रथम अध्याय: हे श्रद्धालुओ! अब मैं आपको उस परम पावन कथा का श्रवण कराता हूँ, जो त्रेता युग में भगवान श्रीराम के वनवास काल से संबंधित है और जो 'रामेश्वर मूलपीठ' है। एक समय की बात है, जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम, माता सीता और भ्राता लक्ष्मण के साथ वनवास भोग रहे थे। चित्रकूट के पावन वनों में विचरण करते हुए, भगवान श्रीराम के मन में शिवपुत्री मां नर्मदा (रेवा) के दर्शन की तीव्र अभिलाषा जागृत हुई। अपनी इसी इच्छा को पूर्ण करने हेतु वे दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान कर गए। भगवान श्रीराम, सुतीक्षण ऋषि के आश्रम से होते हुए और शरभंग ऋषि के पावन आश्रम (धारकुण्डी) के दर्शन कर जाबालि ऋषि के आश्रम क्षेत्र की सघन पहाड़ियों में पहुँचे। जाबालि ऋषि घोर तपस्या में लीन थे, जिनके नाम से वह क्षेत्र आगे चलकर जबलपुर कहलाया।
द्वितीय अध्याय:
नर्मदा के सुरम्य तट पर पहुँचकर भगवान श्रीराम अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने इसी पर्वतीय क्षेत्र में देवाधिदेव महादेव की आराधना करने का संकल्प लिया। अपनी भक्ति को प्रत्यक्ष रूप देने हेतु, श्रीराम ने स्वयं अपने कर-कमलों से नर्मदा की बालू (रेत) एकत्रित की और एक अत्यंत सुंदर शिवलिंग का निर्माण किया। भगवान ने अपने करपात्र (हाथों की अंजलि) में नर्मदा का पवित्र जल लेकर, निरंतर एक मास तक उस बालुका शिवलिंग का अभिषेक और पूजन किया। उनकी निश्छल भक्ति और कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर साक्षात् भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए।
तृतीय अध्याय:
भगवान श्रीराम ने जिस प्रकार लंका विजय से पूर्व समुद्र तट पर रामेश्वरम् में बालुका शिवलिंग की स्थापना की थी, वह उनके द्वारा निर्मित अंतिम बालुका शिवलिंग है। इस श्रृंखला में भगवान राम द्वारा निर्मित प्रथम शिवलिंग नर्मदा तट पर जाबालि ऋषि के इसी आश्रम क्षेत्र की गुफा में स्थापित किया गया था। प्रथम स्थापना होने के कारण ही इस दिव्य स्थान को "रामेश्वर मूलपीठ" होने का गौरव प्राप्त है।
चतुर्थ अध्याय:
इस शिवलिंग के 'गुप्तेश्वर' कहलाने के पीछे भी एक रहस्यमयी कथा है। त्रेता युग में पूजन के पश्चात, भ्राता लक्ष्मण ने विचार किया कि इस दिव्य शिवलिंग की पवित्रता अक्षुण्ण रहे और कोई इसका अनादर न कर सके। अतः उन्होंने एक विशाल चट्टान के माध्यम से उस गुफा के द्वार को बंद कर दिया। युगों तक वह शिवलिंग गुफा के भीतर गुप्त रहा। तदुपरांत, सन् 1890 में कुछ चरवाहों और बालकों ने कौतूहलवश उस चट्टान को हटाया, तो उन्हें गुफा के भीतर उस दिव्य शिवलिंग के दर्शन हुए। क्योंकि यह शिवलिंग सदियों तक गुफा में गुप्त रहा और चट्टान से ढका रहा, इसीलिए जनमानस ने श्रद्धापूर्वक इन्हें 'गुप्तेश्वर महादेव' के नाम से पुकारा।जो भी भक्त इस रामेश्वर मूलपीठ की कथा का श्रवण करता है अथवा नर्मदा तट पर स्थित इस प्राचीन सिद्धपीठ के दर्शन करता है, उसे भगवान श्रीराम और महादेव दोनों की संयुक्त कृपा प्राप्त होती है और उसके समस्त मनोरथ सिद्ध होते हैं।
पञ्चम अध्याय:
हे भक्तजनों! अब इस परम पावन कथा के अंतिम भाग का श्रवण करें, जो भक्त के हृदय में अटूट श्रद्धा उत्पन्न करने वाला है। भगवान श्रीराम द्वारा स्थापित यह दिव्य बालुका शिवलिंग मात्र एक पाषाण स्वरूप नहीं, अपितु चैतन्य देव का साक्षात् विग्रह है। कालान्तर में, जब भारत भूमि पर गोंडवाना साम्राज्य का शासन था, तब न्यायप्रिय और धर्मपरायण रानी दुर्गावती की अटूट श्रद्धा इस पीठ पर थी। रानी दुर्गावती अपने मदन महल किले से एक गुप्त सुरंग के माध्यम से प्रतिदिन इस गुफा में महादेव का पूजन करने आती थीं। इस कारण भी इसे गुप्तेश्वर कहा गया। उन्होंने इस स्थान की पवित्रता और एकांत को देखते हुए इसे अपनी साधना का केंद्र बनाया था।
शास्त्रों और विद्वानों का यह स्पष्ट मत है कि भगवान श्रीराम ने अपने वनवास काल का प्रथम बालुका शिवलिंग यहाँ स्थापित किया, जिसके कारण यह "रामेश्वर मूलपीठ" कहलाया। चूँकि इसे रामेश्वरम् ज्योतिर्लिंग का 'उपलिंग' होने का गौरव प्राप्त है, अतः यह घोषणा की गई है कि जो फल दक्षिण के रामेश्वरम् ज्योतिर्लिंग के दर्शन और पूजन से प्राप्त होता है, वही अक्षय पुण्य फल इस रामेश्वर मूलपीठ (गुप्तेश्वर महादेव) की भक्ति मात्र से सुलभ हो जाता है।
जो मनुष्य पूर्ण श्रद्धा के साथ श्री रामेश्वर मूलपीठ कथा का आयोजन करता है, महादेव उसकी समस्त बाधाओं का हरण कर उसे सुख, शांति और मोक्ष प्रदान करते हैं।
॥इति श्रीरामेश्वरमूलपीठकथा आचार्योपदेशावस्थिना विरचिता सम्पूर्णा॥
॥श्रीरामेश्वरार्पणमस्तु॥
॥श्रीमहादेवार्पणमस्तु॥

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