INDORE के जेलर और डॉक्टर के खिलाफ CID जांच होगी, हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली - HC NEWS

Updesh Awasthee
इंदौर/धार, 9 अगस्त 2026:
इंदौर के तत्कालीन जेलर राजाराम डांगी और डॉ. कमलेश कुमार अहिरवार के खिलाफ CID जांच होगी। दोनों ने हाई कोर्ट में एक याचिका दाखिल करके मध्य प्रदेश सरकार द्वारा उनके खिलाफ शुरू की गई CID जांच के आदेश को खारिज करने का निवेदन किया था परंतु हाईकोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई ने मजिस्ट्रेट की उस जांच को सही बताया, जिसमें जेलर और डॉक्टर को दोषी घोषित किया गया था। 

घटना का विवरण: ITI ट्रेनिंग के लिए इंदौर आए कैदी की मौत

मामले की शुरुआत 27 फरवरी 2023 को धार जिला जेल में हुई। मृतक कैदी भेरु, जो बलात्कार के मामले में सजा काट रहा था, उसे आईटीआई प्रशिक्षण के लिए इंदौर से धार जेल स्थानांतरित किया गया था। दोपहर की तलाशी के दौरान एक अन्य कैदी अरविंद के पास तंबाकू की पुड़िया मिली, जिसने पूछताछ में बताया कि उसे यह तंबाकू भेरु ने दी थी। सूत्रों और साक्ष्यों के अनुसार, इसके बाद जेल की 'सर्च टीम' ने भेरु को बुलाया और तंबाकू के संबंध में उसे लाठियों और बेल्ट से बेरहमी से पीटा। गंभीर रूप से घायल भेरु को शाम को जिला अस्पताल ले जाया गया, जहाँ रात 8:00 बजे उसे मृत घोषित कर दिया गया। 

न्यायिक जांच और चौंकाने वाले खुलासे

घटना के बाद धारा 176(1-A) Cr.P.C. के तहत न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC), धार द्वारा जांच शुरू की गई। मजिस्ट्रेट की रिपोर्ट में पाया गया कि भेरु की मौत प्राकृतिक नहीं थी, बल्कि शारीरिक प्रताड़ना, तनाव और सदमे का परिणाम थी। जांच में जेल प्रहरी ओंकार चौहान, जेलर श्याम वर्मा, अब्दुल रज्जाक खान और मुकेश सोलंकी को सीधे तौर पर पिटाई का दोषी पाया गया। सबसे गंभीर आरोप जेल अधीक्षक राजा राम डांगी और डॉ. कमलेश कुमार अहिरवार पर लगे, जिसके आधार पर FIR संख्या 0336/2023 दर्ज की गई। 
जेल अधीक्षक (राजा राम डांगी): भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304 (आपराधिक मानव वध जो हत्या नहीं है)।
डॉ. कमलेश कुमार अहिरवार: IPC की धारा 201 (साक्ष्य मिटाना) और धारा 218 (लोक सेवक द्वारा गलत रिकॉर्ड तैयार करना)।

1. याचिकाकर्ताओं (जेल अधीक्षक और डॉक्टर) का पक्ष:

वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बगड़िया ने तर्क दिया कि धारा 176(1-A) के तहत मजिस्ट्रेट का काम केवल मौत का 'कारण' (प्राकृतिक या अप्राकृतिक) पता लगाना है, किसी व्यक्ति को आरोपी बनाना नहीं।
राजा राम डांगी ने दावा किया कि वे घटना के समय वहां मौजूद नहीं थे और जेल के एंट्री रजिस्टर में उनका नाम नहीं है। उन्होंने इसे अधीनस्थ कर्मचारियों की गलती के लिए 'विकैरियस लायबिलिटी' (vicarious liability) डालने का प्रयास बताया।
डॉ. कमलेश कुमार अहिरवार ने तर्क किया कि उन्होंने पोस्टमार्टम रिपोर्ट में चोटों का सही विवरण दिया था और अंतिम राय केवल विसरा रिपोर्ट के बाद ही दी जा सकती थी।

2. उत्तरदाताओं (मध्य प्रदेश सरकार और मृतक के पिता) का पक्ष:

सरकारी वकील और मृतक के पिता के वकील ने बताया कि जेल अधीक्षक पिटाई के समय वहां मौजूद थे और उन्होंने घायल भेरु की मदद की गुहार को अनसुना कर दिया।
आरोप लगाया गया कि जेल प्रशासन ने साक्ष्य मिटाने के लिए मृतक की उल्टी साफ करवाई, उसे एक बैरक से दूसरे बैरक में घुमाया और इलाज में जानबूझकर देरी की।
डॉक्टरों पर आरोप लगा कि उन्होंने आरोपियों को बचाने के लिए जानबूझकर अस्पष्ट पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार की और पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी वाली सीडी (CD) जानबूझकर धुंधली (Blurred) बनाई।

न्यायालय का विस्तृत निर्णय और विशेष टिप्पणियां

उच्च न्यायालय ने याचिकाओं को खारिज करते हुए निम्नलिखित महत्वपूर्ण व्यवस्थाएं दीं:
कोर्ट ने रामशरण प्रजापति बनाम म.प्र. राज्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि धारा 176(1-A) के तहत मजिस्ट्रेट को केवल मौत के कारण तक सीमित नहीं रखा जा सकता; वह उन व्यक्तियों के नाम भी उजागर कर सकता है जो मौत के लिए जिम्मेदार हैं।
कोर्ट ने चश्मदीद गवाह (कैदी नितिन) की गवाही पर भरोसा किया, जिसने पुष्टि की कि अधीक्षक डांगी वहां मौजूद थे और उन्होंने भेरु को पिटते हुए देखा था, फिर भी उसे कोई चिकित्सा सहायता नहीं दी।
कोर्ट ने माना कि अधीक्षक की देखरेख में साक्ष्य मिटाने के प्रयास हुए और डॉक्टरों ने धुंधली वीडियोग्राफी के माध्यम से प्रताड़ना के निशान छिपाने की कोशिश की, जो IPC की धारा 201 और 218 के तहत अपराध की श्रेणी में आता है।

न्यायाधीश की विशेष टिप्पणी: न्यायालय ने जेल अधीक्षक के व्यवहार को "अत्यधिक संवेदनहीनता और क्रूरता" का उदाहरण बताया और कहा कि सर्वोच्च प्रभारी होने के नाते उनके नेतृत्व में पूरी प्रशासनिक व्यवस्था विफल रही। अब इस मामले की जांच C.I.D. द्वारा की जा रही है, और उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया है कि जांच निष्पक्ष और त्वरित रूप से पूरी की जाए। रिपोर्ट: उपदेश अवस्थी (विधि सलाहकार एवं पत्रकार)।

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