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अभावों के बीच दम तोडती सरकारी शिक्षा को कोन बचाये ? | SHIKSHAK DIWAS SPECIAL

आज एक बार फिर शिक्षक दिवस के अवसर राष्ट्र के पंच से लेकर प्रधान तक शिक्षा के महत्त्व पर अपने विचार व्यक्त करते हुए देश की शिक्षा प्रणाली को बेहतर बनाने का वादा भी करेंगे लेकिन जमीनी हकीकत यह है आज़ादी के बहोत्तर बरस बाद भी देश की सरकारी शिक्षा प्रणाली की बदहाल सूरत सवरी नही है। आज बहोत्तर बरस बाद भी देश की सरकारी शिक्षा घने अभावों के बीच खुद को जिंदा बनाये रखने हेतू संघर्ष करती नज़र आ रही है। आधुनिक डिजिटल इंडिया में सरकारी शिक्षा की बदहाली का आलम यह है कि देशभर में शिक्षकों के लाखों पद वर्षों से रिक्त पडे हुए है। हर बरस सरकारे शिक्षकों की भर्ती करने के वादे भी करती है किन्तू वादे है वादों का क्या है इसी में उलझकर शिक्षकों की भर्ती हो नही पाती है। देशभर के ग्रामीण अंचलों के हजारों प्राथमिक स्कूल शिक्षकविहीन है। हायर सेकंडरी स्कूलों में विषय के विषय विशेषज्ञ शिक्षकों के पद वर्षों से रिक्त ही पड़े है। ऐसा भी नही है कि सरकार ओर उसके जिम्मेदार लोगो को सरकारी शिक्षा की बदहाली का पता नही है किन्तू सरकारी शिक्षा की दशा सुधारने की बजाय सरकारी स्कूलों को दूसरे स्कूलों में मर्ज कर स्कूलों बन्द किये जा रही है।  

देशभर में सबसे ज्यादा सरकारी स्कूल ग्रामीण क्षेत्रो में है और सरकारी शिक्षा की सबसे ज्यादा बदहाली दूरस्थ ग्रामीण अंचलों में देखी जा सकती है। अधिकांश शिक्षकविहीन शालाये दूरस्थ ग्रामीण अंचलों में ही है। नियमित शिक्षक भर्ती नही होने से  देशभर के राज्यो में अल्प वेतन पर शिक्षकों की भर्ती कर काम चलाना आज अमूमन एक प्रथा सा बन गया है। अल्प वेतनमान प्राप्त शिक्षक जिनका बीमा है न पेंशन है बल्कि उनको अपने ही भविष्य का टेंशन है उनसे सरकार व उसके जिम्मेदार आखिर कैसे सरकारी शिक्षा की बेहतरी ओर गुणवत्ता की अपेक्षा कर सकते है फिर भी अल्पवेतन ओर अल्पवेतन और अल्प संसाधनों के बीच दम तोड़ती सरकारी शिक्षा  निजी क्षेत्र की शिक्षा व्यवस्था के मुकाबले अपेक्षाकृत बेहतर ही परिणाम देती आई है लेकिन अफसोस इस बैठक है कि फिर भी जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग सरकारी शिक्षा की दशा और दिशा सुधारने का कोई ठोस कदम उठाते नही है।

देश की सरकारी शिक्षा की बदहाली की मुख्य वजह शिक्षा का राजनीतिकरण होना है। शिक्षा राष्ट्र का आईना होती है और किसी भी किसी भी राष्ट्र के उत्थान व प्रगति में उसकी शिक्षा का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। आज विश्व मे जो भी देश विकास की दौड़ में आगे बढे है तो उसका श्रेय उनकी शिक्षा पद्धति को जाता है। हमारे देश की प्राचीन शिक्षा पद्धति तो विश्वभर में आदर्श है। आज भी दुनिया के देशों मे नालन्दा तक्षशिला उज्जैन जैसे प्राचीन भारतीय शिक्षा के केंद्रों की दुहाई दी जाती है लेकिन इसे विडम्बना कहे या फिर दुर्भाग्य कहे कि आधुनिकता के इस दौर में विश्व गुरु भारत की ही सरकारी शिक्षानीति भ्रष्ट राजनीति का शिकार होकर बदहाल स्थिति में पहुच गई है। आज विश्व के अधिकांश देशो ने हमारी ही प्राचीन शिक्षा पद्धति को अपनाकर सक्षम विकसित ताकतवर राष्ट्रों के रूप में अपनी पहचान बनाई हुए है। जबकि हमारे देश के राजनेताओं ने सत्ता स्वार्थ के मुनाफे के खातिर हमारी शिक्षा पद्धति को जात पात ओर धर्म के रंग कर उसका वैभव ही मिटा दिया है।

आज शिक्षक दिवस पर सरकार और जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों के साथ देश के प्रत्येक नागरिक को देश की बदहाल सरकारी शिक्षा को कैसे वापस गौरवशाली आदर्शमय शिक्षा बनाई जाए इस पर गहन चिंतन करना होगा ओर सरकारी शिक्षा की बदहाली के कारणों को दूर कर शिक्षा को राजनीति से मुक्त करना होगा। सरकार के जिम्मेदार लोगों को चारित्र्यवान आत्मनिर्भिक रोजगार मूलक शिक्षानीति बनाकर  शिक्षको के विभीन्न सवर्ग खत्मकर आरटीई के नियमो के अनुसार छात्रों के अनुपात में विषयवार शिक्षको की नियमित भर्ती कर उन्हें सम्मानजनक वेतनमान और अधिकार देना होगा तभी सही मायनों में बदहाल शिक्षा व्यवस्था में जान आएगी ओर तभी सही मायनों में शिक्षक दिवस मनाने की सार्थकता सिद्ध होगी अन्यथा हर बरस की भांति शिक्षक दिवस पर शिक्षको के सम्मान के महज रस्म अदायगी भर मेले लगाने से सरकारी शिक्षा सवरने वाली नही है।
अरविंद रावल
अध्यापक
51 गोपाल कॉलोनी झाबुआ म. प्र.
मोबाइल न. 9340579251
Email - arvind.rawal69@gmail.com