SAPAKS: सियासत के कच्चे लोग हैं, मजाक बन जाएंगे | praveen dubey blog @ mp election

03 October 2018

भोपाल। प्रमोशन में आरक्षण के खिलाफ उपजा संगठन सपाक्स अब एक राजनीतिक दल बन गया है। इसी के साथ लोगों को इसे देखने का नजरिया भी बदल गया। कल तक जो सवर्ण आंदोलन में सपाक्स को महत्व दे रहे थे अब उसकी समीक्षा करने लगे हैं। पिछले दिनों खबर आई थी कि सपाक्स चीफ डॉ हीरालाल त्रिवेदी की सीएम शिवराज सिंह से मधुर माहौल में मुलाकात हुई है। अब इस मुलाकात के मायने निकाले जा रहे हैं। न्यूज18 मध्यप्रदेश ने सपाक्स आंदोलन को काफी प्रमोशन दिया था। अब न्यूज18 मध्यप्रदेश के सीनियर एडिटर सपाक्स की समीक्षा करते हुए लिख रहे हैं कि सपाक्स के पदाधिकारी सियासत के कच्चे लोग हैं, जल्द ही मजाक बन जाएंगे। 

प्रवीण दुबे ने अपनी समीक्षा में लिखा है कि एमपी में कल तक सरकार का सबसे बड़ा सिर दर्द बना सवर्ण आंदोलन, कल राजनैतिक दल बनते ही सूबे की भाजपा सरकार को लंबी, गहरी ठंडक वाली सांस का अहसास करा गया होगा। इस आंदोलन से यूँ तो कांग्रेस और भाजपा दोनों ही डर रहे थे लेकिन सबसे ज्यादा मुश्किल भाजपा की थी क्यूंकि ठीकरा हमेशा सत्ताधारी दल के सर ही फूटता है।

पूरे प्रदेश में गैर राजनैतिक दलों के सवर्णों के बढ़ते समर्थन को देखकर भाजपा को कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि वो क्या करे। आलम ये था कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तो इनके आन्दोलन से जुड़े सवाल से ही असहज हो जाते थे। कल सपाक्स ने चुनाव लड़ने का ऐलान करके सभी खेमों में प्रसन्नता भर दी। वो गुब्बारा जो इस सीमा तक बढ़ रहा था कि सूर्य की रौशनी को ढक रहा था,वो अब पिचक जाएगा।

दरअसल अव्वल तो सपाक्स पूरे सवर्णों का संगठन नहीं है, बल्कि सामान्य वर्ग के कर्मचारियों का संगठन है, जो सिर्फ प्रमोशन में आरक्षण के मुद्दे पर पैदा हुआ था। सपाक्स के पास ऐसे करिश्माई नेता भी नहीं हैं जो सामान्य वर्ग में प्रमुखता से ग्राह हों। अब जो गली-गली में सामान्य वर्ग के लोगों का आक्रोश था, वो सपाक्स के नेताओं को तो अपना मानने से रहे। ज़ाहिर है कि वे फिर से या तो कांग्रेस या भाजपा की तरफ उम्मीद से देखना शुरू करेंगे।

सपाक्स के इन नेताओं की महत्वाकांक्षा दिल्ली के रामलीला मैदान में हुए अन्ना आंदोलन को देखकर जागी होगी। वे यह भूल गए कि अन्ना आन्दोलन केजरीवाल का खड़ा किया हुआ नहीं था,बल्कि अन्ना हजारे की निर्विवाद छवि में लोगों को आधुनिक गांधी दिखता था। उस आन्दोलन में ढेरों युवा भी जुड़ गए थे। एमपी के सवर्ण आन्दोलन की चिंगारी शोला बन ही नहीं पाई और उसके कर्ता-धर्ताओं की महत्वाकांक्षा ने उस पर कई गैलन पानी उड़ेल दिया।

अब कांग्रेस के उस आरोप में दम दिखने लगा है कि ये भाजपा की "बी टीम" है। अव्वल तो ये पिछले चुनाव में उमा भारती की जनशक्ति पार्टी की तरह कुछ वोट कटवा बनकर भाजपा को ही फायदा पहुंचाएंगे। अभी तो इनके उम्मीदवारों की चीर-फाड़ शुरू होगी, जो इनके ही लोग करेंगे। चूँकि ये सियासत के कच्चे लोग हैं, लिहाज़ा ये आरोपों के जवाब में बौखलाना शुरू करेंगे और रोज़ एक मुद्दा देकर मज़ाक का विषय बनेंगे।

अच्छे भले "पाव" की भूमिका में थे ये और जिसके साथ जाते उसे "सवा सेर" करते लेकिन ये खुद सेर बनने के फेर में पूरे उस आन्दोलन को निगल लेंगे, जो तख्ता पलट का माद्दा रखता था। संभव है कि भाजपा खुद इन्हें चुनाव तक फंडिंग करे ताकि आपस में लड़वाकर अपने फिक्स वोटर के ज़रिये अपने उम्मीदवार को जितवाया जा सके। कुल मिलाकर एमपी का सबसे मजबूत आन्दोलन चंद लोगों की उबलती, खौलती सियासी उम्मीदों का काढ़ा बनकर रह जाएगा।
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