सभी प्रमोट हुए आरक्षित कर्मचारियों को रिवर्ट करें: सपाक्स ने बताया सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का विवरण | MP NEWS

06 October 2018

भोपाल। सपाक्स ने सुप्रीम कोर्ट में हुए निर्णय को बिन्दुवार स्पष्ट करते हुए मांग की है कि मध्यप्रदेश शासन सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार सभी आरक्षित कर्मचारियों का प्रमोशन रिवर्ट करें एवं जबलपुर हाईकोर्ट द्वारा दिए गए निर्णय का पालन करें। सपाक्स ने दावा किया है कि सुप्रीम कोर्ट में आया निर्णय उनके आंदोलन की जीत है। सपाक्स ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का जो विवरण दिया है, वो हम यथावत प्रस्तुत कर रहे हैं, पढ़िए: 

दिनांक 30.04.2016 को माननीय हाई कोर्ट जबलपुर के द्वारा एम. नागराज केस के निर्णय के आधार पर म.प्र. पदोन्नति नियम 2002 को खारिज कर इस नियम के तहत हुई अनु. जाति/ जनजाति वर्गों की पदोन्नतियों को शून्य घोषित कर दिया था एवं माननीय हाईकोर्ट ने इन नियमों के तहत पदोन्नत अनु.जाति/जनजाति वर्ग के अधिकारी/कर्मचारियों को तत्काल रिवर्ट (पदावनत) करने के आदेश दिये थे।

इस निर्णय के विरूद्ध में म.प्र. सरकार ने लाखों सामान्य, पिछड़ा व अल्प संख्यक वर्ग के अधिकारियों/ कर्मचारियों के हितों को अनदेखा करते हुये माननीय सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी तथा अनेक ख्यातिलब्ध अधिवक्ताओं को करोड़ो की फीस का भुगतान भी किया। इन्हीं अधिवक्ताओं के माध्याम से सुप्रीम कोर्ट में मांग रखी कि जिस एम. नागराज प्रकरण के निर्णय के आधार पर माननीय जबलपुर हाईकोर्ट ने म.प्र. पदोन्नति नियम 2002 निरस्त किये हैं, वो निर्णय ही गलत है अतः एम. नागराज प्रकरण के निर्णय को 7 जजों की संवैधानिक पीठ को पुनर्विचार हेतु भेजा जावे।

दिनांक 26.09.2018 को माननीय सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संवैधानिक पीठ ने सर्वसम्मति से निर्णय दिया कि एम. नागराज केस के निर्णय पर पुर्नविचार करने की आवश्यकता नहीं है। इस निर्णय को 2006 से लेकर वर्तमान तक सुप्रीम कोर्ट के 10 से अधिक अन्य केस में भी परखा गया है एवं सही पाया गया है। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में प्रमोशन में आरक्षण दिये जाने के पूर्व निम्न शर्तों का पालन अनिवार्य किया है:- 

1. प्रत्येक सर्विस की कैडर में अनु.जाति./जनजाति प्रतिनिधित्व के संख्यात्मक आंकड़े जुटाने होंगे एवं पर्याप्त प्रतिनिधित्व होने पर पदोन्नजति में आरक्षण नहीं दिया जा सकेगा । निर्णय का पैरा 17 (पेज 48) :- 
यहॉ पर यह उल्लेखनीय है कि म.प्र. के कई विभागों के सभी केडर में अनु.जाति /जनजाति का प्रतिनिधित्व निर्धारित अनुपात से भी अधिक है। 

2. अनु.जाति./जनजाति को अधिकारी /कर्मचारियों में भी क्रीमीलेयर का निर्धारण करना होगा। इस निर्धारण के बिना आरक्षण नहीं दिया जा सकता है। निर्णय का  पैरा 15 (पेज 42) एवं पैरा 19 (पेज 55)
3. विभिन्न केडर में अनु.जाति./जनजाति के पर्याप्त प्रतिनिधित्व के संबंध में भी माननीय सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट दिशा निर्देश जारी कर कहा है कि जैसे जैसे उच्चवतर पदों पर जायेंगे, आरक्षण की व्यदवस्थार घटाना होगी। निर्णय का पैरा 17 (पेज 48) एवं पैरा 20 (पेज 55)
4. प्रमोशन में आरक्षण देने में प्रशासनिक दक्षता प्रभावित नहीं होगी इस बात का भी अनिवार्य रूप से ध्यान रखना होगा। 

उपरोक्त बिन्दुओं के आधार पर ही माननीय जबलपुर हाईकोर्ट ने म.प्र. पदोन्नति नियम 2002 खारिज किये थे। माननीय सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संवैधानिक पीठ के द्वारा उक्त बिन्दुओं की आवश्यकता को पुन: स्थापित करते हुये ही निर्णय दिया है। 

अतः माननीय जबलपुर हाईकोर्ट के निर्णय को लागू नहीं करने का अब कोई आधार नहीं बचा है। सपाक्स म.प्र. शासन से मांग करती है कि दिनांक 26.09.2018 को माननीय सुप्रीम कोर्ट के द्वारा दिये गये निर्णय के उपरांत तत्काल माननीय हाईकोर्ट जबलपुर के निर्णय का पालन करें। पदोन्नति नियम 2002 के तहत पदोन्नत सभी अनु.जाति/जनजाति वर्ग के शासकीय सेवकों को पदावनत कर वर्ष 2002 की वरिष्ठता के आधार पर पदोन्नितियॉं की जावें। ताकि सपाक्स वर्ग के अधिकारी /कर्मचारी जो विगत 16 वर्षों से इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था के तहत पीड़ित है, इन्हें तत्काल न्याय दिलाया जावे।

संविधान पीठ के निर्णय का पैरा 15 (पेज 42) :- 
when it comes to the creamy layer principle, it is important to
note that this principle sounds in Articles 14 and 16(1), as unequals within the same class are being treated equally with other members of that class.

संविधान पीठ के निर्णय का पैरा 17 (पेज 48) :- 
Thus, we may make it clear that quantifiable data shall be collected by the State, on the parameters as stipulated in Nagaraj (supra) on the inadequacy of representation, which can be tested by the Courts. We may further add that the data would be relatable to the concerned cadre.

संविधान पीठ के निर्णय का पैरा 19 (पेज 55) :- 
Shri Dwivedi’s argument cannot be confused with the concept of "creamy layer which, as has been pointed out by us hereinabove, applies"to persons within the Scheduled Castes or the Scheduled Tribes who no longer require reservation, as opposed to posts beyond the entry stage,which may be occupied by members of the Scheduled Castes or the Scheduled Tribes.

संविधान पीठ के निर्णय का पैरा 17 (पेज 48) :- 
Thus, we may make it clear that quantifiable data shall be collected by the State, on the parameters as stipulated in Nagaraj (supra) on the inadequacy of representation, which can be tested by the Courts. We may further add that the data would be relatable to the concerned cadre.

संविधान पीठ के निर्णय का पैरा 20 (पेज 55) :-
Test for determining adequacy of representation in promotional posts to the States for the simple reason that as the post gets higher, it may be necessary, even if a proportionality test to the population as a whole is taken into account, to reduce the number of Scheduled Castes and Scheduled Tribes in promotional posts, as one goes upwards. This is for the simple reason that efficiency of administration has to be looked at every time promotions are made.
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