मप्र में स्टेनोग्राफर्स की उपेक्षा की असल वजह क्या है ? | KHULA KHAT

29 July 2018

योगेन्द्र सिंह पवार/होशंगाबाद। उच्चतम न्यायालय और देश के कुछ राज्यों के उच्च न्यायालयों ने समान काम के लिए समान वेतन के संबंध में समय-समय पर निर्णय पारित किये हैं। यही नैसर्गिक न्याय का सिद्धान्त भी  है। संविधान के अनुच्छेद 04 में नीति-निर्देशक तत्वों में भी समान कार्य के लिए समान वेतन की बात कही गई है। प्रदेश में विपक्षी दलों के जन-प्रतिनिधि ही नहीं, सत्ताधारी दल के बहुत-से विधायक भी मानते हैं कि प्रदेश में एक समान भर्ती नियम, सेवा शर्तें, वेतनमान और पदोन्नति अवसर कर्मचारियों को मिलना चाहिये। शासकीय सेवकों में भेदभाव नहीं होना चाहिये। इसके बावजूद, राज्य में स्टेनोग्राफर्स के वेतनमान और पदोन्नति अवसरों में वर्षों से विसंगतियॉं विद्यमान हैं। 

प्रदेश के वित्तमंत्री भी राजभवन, मंत्रालय, विधानसभा के कर्मचारियों की सेवाओं को विशिष्ट श्रेणी की मानते हैं। मतलब उनकी नजरों में मंत्रालय, विधानसभा, राजभवन से इतर विभिन्न विभागों और मैदानी इलाकों में काम करने वाले कर्मचारी के सेवायें गौण हैं। शासकीय सेवकों में यह भेद उनके बीच मन-मुटाव, आक्रोश, ईर्ष्या, अविश्वास तो पैदा करेगा ही, कार्यक्षमता और कार्य की गुणवत्ता पर भी इसका असर होगा, जिसका दुष्प्रभाव समूचे प्रदेश पर पडेगा। हकीकत तो यह है कि, जिला,ब्लॉक लेवल पर, मैदानी स्तर पर असुविधाओं, कठिनाइयों के बीच काम करने वाले कर्मचारियों की कार्यक्षमता राजधानी में बहुमंजिला इमारतों में बैठकर काम करने वाले कर्मचारियों के मुकाबले बीस ही मिलेगी, उन्नीस नहीं। 

स्टेनोग्राफर्स का 1972 में प्रदेश में एक ही कॉडर था, जो 15 अन्य कॉडर्स के समकक्ष अथवा उनसे अधिक वेतनमान प्राप्त कर रहा था, उपेक्षा का शिकार होकर आज इन सभी कॉडरों में सबसे कम वेतनमान पर अवस्थित है। चौथे केन्द्रीय वेतन आयोग के समय 1986 में सिंहदेव समिति की सिफारिशों से असंगत आधारों पर कॉडर को मंत्रालय और गैर-मंत्रालय में बांटा जाकर मंत्रालयीन स्टेनोग्राफर के मुकाबले गैर-मंत्रालयीन स्टेनोग्राफर्स को निम्न वेतनमान दिया गया। यही नहीं, पदोन्नति अवसरों में विसंगतियां भी की गईं। नतीजे में लगातार पांचवे, छटवें और अब सांतवें वेतन आयोग में वेतन विसंगति का खमियाजा गैर-मंत्रालयीन स्टेनोग्राफर्स उठा रहे हैं। 

गैर-मंत्रालयीन स्टेनोग्राफर्स ने समय-समय पर इन विसंगतियों पर सरकार का ध्यान ज्ञापनों के माध्यम से आकृष्ट भी कराया। सरकार ने क्रमोन्नति योजना लागू की, जो पर्याप्त लाभकारी नहीं रही। ब्रम्हस्वरूप समिति ने अपने प्रतिवेदन में कॉडर विभाजन को अन्यायपूर्ण बताकर स्टेनोग्राफर्स के वेतनमान समान किये जाने और 9ः3ः1 के अनुपात में पदों को रखना समाप्त किये जाने की राय दी।  

दुर्भाग्यपूर्ण है कि, राजनीतिक फायदे के लिए हितों की उपेक्षा करते हुए इस कॉडर को वोट बैंक की नजर से देखा जा रहा है। आरक्षण के नाम पर कर्मचारियों-अधिकारियों के बीच जाति भेद और विद्वेष सुलगा दिया गया है। पूरे प्रदेश में विभागाध्यक्ष कार्यालयों में काम कर रहे गैर-मंत्रालयीन स्टेनोगाफर्स बमुश्किल 1000 ही होंगे, जिनकी मॉगों की पूर्ति पर बहुत अधिक वित्तीय भार भी नहीं पड़ने वाला है। स्पष्ट है, वोट बैंक की नजर से सरकार की नजर में इस कॉडर कोई महत्ता नहीं रखने के कारण ही यह संवर्ग पहले भी उपेक्षत था और अब भी है। सत्ता की लालसा में वोटबैंकों पर गिद्ध-सी नजर रखी जाकर चीन्ह-चीन्ह कर रेवडि़यां बांटी जा रही हैं। कहीं खीर खाई जा रही है, कहीं रूखी-सूखी भी मयस्सर नहीं हो रही।
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